Home उत्तर प्रदेश नारी उत्थान नारी द्द्वारा सम्भव

नारी उत्थान नारी द्द्वारा सम्भव

समय के बदलते परिवेश में हमारे समाज में नारियों ने अपना मजबूत स्थान बनाया है। वर्षों से हमारे समाज में अनेक महान हस्तियों ने नारी उत्थान के लिये अनेक प्रयास किये हैं। परिणाम स्वरूप बदलते समय के साथ समाज में जागरूकता आयी है। मगर इसका असर पूरे देश में एक समान नहीं हुआ है। यह हम देश के अनेक राज्यों के कई जिलों में बारीकी से देखने के बाद कह सकते हैं। ऊपरी सतह पर हमें सब कुछ सामान्य लगता है मगर आज भी कई जगह जहाँ नारी स्वच्छ्न्द हुई है वहीं दूसरी तरफ आज भी बंदी के समान दिखती हैं।

विधवा किसी भी आयू में वह चाहे बाल अवस्था ही क्यों ना हो; एक समय था जब समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ज्यादा दयनीय थी। बचपन में भी हुए बाल विवाह और दुर्भाग्य से विधवा हो जाने पर नारियों बच्चियों का पूरा जीवन सफेद वस्त्र धारण करके सिर मुडँवाकर लगभग सभी लौकिक सुखों से वंचित रहकर बिताना पड़ता था। किसी भी उम्र की विधवा हों; उन्हें संसार के सभी रंगों से वंचित कर दिया जाता था। घर समाज के किसी भी शुभ कार्यों से उन्हें दूरी बनाए रखने का आदेश होता था। विधवा विवाह के बारे सोचना भी पाप होता था। महान समाजसेवी ईश्वरचंद विद्दासागर जी ने १८५६ में भारत में पुनर्विवाह संघ की स्थापना करके इसे कानूनी मान्यता दिलाई थी। इन सब बुराईयों पर समाज के ही संवेदनशील लोगों ने लगाम लगायी। शिक्षित, ज्ञानी, विद्दानों ने अगुवाई की और देश आजाद के साथ नारी भी धीरे धीरे सशक्त होती चली गयी।

एक तरफ यूपी में जहाँ अनेक जिलों में विधवा होने पर भाई बेटे के नाम पर मायके से साजो श्रंगार का भरपूर सामान आता है। संवेदंशीलता का भरपूर परिचय दिया जाता हैं तो वहीं राजस्थान के कई इलाकों में विधवा होने पर कुप्रथा का कुरूप चेहरा आज भी देखने को मिलता है। जहाँ विधवा होने पर महिला को अकेले कई महीनों तक एकांत में घर किसी एक एक कोने में समय बिताना पड़ता है। वह ना तो किसी से मिल सकती है ना ही दिन के उजाले में घर में भी इधर उधर घूम सकती है। आजीवन घूँघट की आड़ में अरमानों को दफन करती रहती हैं। शिक्षा का आभाव व पुरूष प्रधान समाज ने अपना प्रभुत्त्व जमा रखा है। जड़मत अंधविश्वास कुप्रथाओं ने आज भी देश के कई पिछड़े इलाकों में अपनी जड़ जमा रखी हैं। शिक्षा वहाँ तक पहुँच नहीं पा रही हैं। स्त्री जाति को कोई ऐसा मजबूत सहारा नहीं मिल रहा है जिसके दम पर वह अपनी पीड़ा खुलकर बता पायें। गाँव गाँव पंचायत समाज को इस ओर ध्यान देना चाहिये ताकि नारी शोषित ना हो सके। स्वयं उस समाज में रहने वाली महिलाओं को भी ऐसे अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिये।…

संगीता कुमारी (लेखिका/कवयित्री)

नरोरा एटॉमिक पावर स्टेशन टाउनशिप, बुलंदशहर, यूपी