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व्यथित मन कि कविता

कौन पहर है..
कौन जाने ?
जाड़े में बार बार ,
आँख खुल जाती है,
पर अब लगता है;
सब कुछ चला गया..
बेटे घरबारी हो गए,
बिटिया ससुरैतीन।
साथ था जोड़ीदार का,
चल बसी…
पिछली बरसात।
अब तो बस ..
निकल गया है सब कुछ,
समय का क्या ..
सांस बाकी है;
मिट्टी में वहीं सोन्ध,
बदल गयी बयार गाँव की
अब लोग बाग
साथ नहीं जुटते
सब घुट रहें हैं
भीतर भीतर
पर चुप हैं
समय तो गुजर गया
बस थम जाए सांस
की निकल लें हम भी
अर्थी के साथ
इस बियाबान गाँव से
कि धरती-आकाश ही हैं बस
जाने पहचाने
अपने… सहज से
जो बतिया लेते है कभी
पुराने दिनों की बात
और बाँट लेते हैं
मन की व्यथा।

सिम्मी हसन
बलिया यू.पी.