बदलते साल के साथ नये संकल्प-सुरेश राय

राजसत्ता पोस्ट न्यूज़ पोर्टल (उत्तराखंड)

बदलते साल के साथ नये संकल्प-सुरेश राय

साल खत्म हो गया, पिछले वर्ष के हादसों से पसरे धरातल पर अब उम्मीद के नये कालीन बिछने हैं, हालांकी यह एक चक्र है पुराने से नये होने का और फिर पुराना फिर नया, बीते वर्ष के घाव ने नये वर्ष आने के उत्साह को बहुत हद तक शांत कर दिया है, डर इस बात का है कि नए साल की दहलीज लांघते वक़्त इस बार कोई चूक ना हो जाये जिस वजह से ये प्राणघातक दुश्मन साथ हो लिए थे पिछली बार,

कोविड का नया वेरिएंट ओमिक्रोन देश में प्रवेश कर गया है, वायरस को लेकर शंका और भय पिछले साल के दृश्य को याद करने पर मजबूर कर दे रहें हैं, शासन-सत्ता और समाज-सत्ता डर के नाम पर लिखित और मौखिक बचाव पर सिर्फ दिशा निर्देश जारी करते दिख रहें हैं,

लोकतंत्र की अंतिम सत्ता को बचाने के लिए उसी अंतिम सत्ता के दम पर उसी सत्ता को यानि जनता को पुनः जोखिम में झोंकने की तैयारी है, माननीय न्यायालय के हस्तक्षेप के बावज़ूद भी वही होने वाला है जिसके लिए पक्ष-प्रतिपक्ष महीनों से तैयारी कर रहें हैं, इस बार कोविड का यह तीसरा आक्रमण है, ज़ब यह पहली बार था यानि की दुश्मन एकदम नया और नए अंदाज़ में आक्रमण कर रहा था उस वक्त हम बिना तैयारी के सामाजिक एकता एवं सरकार के सख्त निर्देश के बदौलत इसका डंटकर मुकाबला कर सके, फिर दूसरा आक्रमण हुआ, कारण चाहे जो हुआ दुश्मन के प्रति पहले साल की तरह सख़्ती ना बरतने, लापरवाही करने और यहाँ तक कि बेअंदाज़ भीड़ ने वायरस को दरवाजा-दरवाजा लाकर खड़ा कर दिया अब ऐसे में बचना संभव कैसे हो सकता था, इस वर्ष हमारे पास दोनों वर्षों के ज्वलंत अनुभव हैं|

वर्तमान परिदृश्य में राजनीति अगर लोक की समस्या को समझना चाह रही है तो उसे एक बार पिछले साल के भयावह मंजर को पुनः स्मृति करना होगा अन्यथा लोकतंत्र के दरवाजे से घुसकर आम जन के बेबसी जड़े तालों को तोड़कर सिर्फ उनके आबरू को लूटा जाना बाकी रह जाएगा, लोकतंत्र में जनता ही सबकुछ है और अगर उनके जीवन को जोखिम में डालकर राजनीतिक जलसे, सभाएं और भीड़ इकट्ठे किये गए तो फिर यह लोकतंत्र के साथ सदी का सबसे बड़ा मजाक साबित होगा,

कोविड ने गाँव की प्रासंगिकता को बढ़ाया, वर्षों से जो अविश्वास बना था आयुर्वेद एवं गिलोय, तुलसी पत्ता इत्यादि जड़ी-बूटीयों के महत्व को लोग समझे, बहुतों की नौकरी चली गयी बहुत अब भी नहीं उबर पा रहे और बहुत इंजिनियर आज चाय की दुकान तक खोले हैं, बहुतों ने स्वरोजगार शुरू किया जो अन्य के रोजगार का भी माध्यम बना है, कोविड काल में वर्क फ्राम होम शुरू हुआ जिसके कारण बहुत हद तक पर्यावरण क्षति से लेकर प्राकृतिक संसाधन के दोहन के रफ्तार को धीमा किया, मतलब बहुत कुछ जिसे सीखना था हमें उस आपदा से निकले नये तरीकों से|

समाज में लोग एक दूसरे के नजदीक आये तो कहीं अपनों द्वारा ही मृत्यु शैया पर लेटे या अंतिम विदाई तक रिश्तों के खोखले रूप को उजागर कर ही दिया, यह सामाजशास्त्र के लिए विमर्श का बड़ा विषय है, बहुत परिवार अभी भी सदमे में हैं,

सोशल मिडिया कामोंबेश रजाई में बैठकर क्रांति ला रहा है, और बेबस सड़कों पर शीत में तङप रहें हैं, आम जनमानस बहुतायत में खेमे का शिकार हो गया जो दूसरे खेमे को किसी भी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं करने वाला, विचारधारा राजनीति से गायब है पर विचारधारा के नाम पर आम जन आपसी सामंजस्य को खंडित करते जा रहें हैं,

सुधार के मुख्य मुद्दे पृष्ठ से गायब हैं और पक्ष-प्रतिपक्ष सुधार के ख़याली पुलाव परोसने में व्यस्त है, सब एजेंडागत राजनीति में लिप्त हैं और हम उस एजेंडा के निचले पायदान के सिपाही, जिसके हाँथ में तलवार है पर रिमोट कंट्रोल सेनापति के हाँथ में, एक सेनापति राजनीति में है जो मंच से बोलता है, एक सोशल मिडिया में बोलता है और एक इलेक्ट्रोनिक मिडिया के स्टूडियो से बोलता है, सभी पार्टियों ने अपने सेनापति मैदान में उतार दिए हैं और दो शब्द के केंद्र में सारे वोट बैंक का सर्वे करा ले रहें हैं “अंधभक्त एवं चापलूस”

हम बहते जा रहें हैं इशारे पर, किन्तु एहसास इसीलिए नहीं हो रहा है क्योंकि हम अपने विवेक, क्षमता और पुरुषार्थ का प्रयोग नहीं कर रहें हैं ठीक वैसे ही जैसे आँख बंद करके ट्रेन में बैठ जाइये ट्रेन तो चल रही है हमें पहुँचा भी रही है पर हमारा श्रम नहीं है उसमें,

सामाजिक चेतना में जिस श्रम की बात होनी चाहिए वह है प्रतिरोध की, सहयोग-असहयोग के साथ बहिष्कार की पर इसके लिए एक शर्त का कठोरता से अनुपालन करना होगा कि हमें सत्य और सच्चाई की रेखा को बहुत ही बारिकी से पकड़कर चलते रहना होगा,,,,

ईश्वर करें कि हम कोविड के नये खेप के साथ नये साल में पिछले गलतियों को पुनः दुहाराने से बचें, स्वयं को पहचाने एवं अपने सामर्थ्य को सही दिशा दें तथा अपने पुरुषार्थ को जिन्दा रखें फिर जाकर स्वाभिमानी भारत को गढ़ना शुरू कर पाएंगे हम जो आत्मविश्वास से परिपूर्ण सशक्त राष्ट्र होगा और हम विश्वगुरु होने की खोई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर सकेंगे🙏

एक नये इच्छाशक्ति के साथ नये साल की यात्रा की मांगलकामनाएं🙏

सुरेश राय चुन्नी

Leave A Reply

Your email address will not be published.