Home कविता/शायरी मिश्रित अहसास

मिश्रित अहसास

मिश्रित अहसास से
विभोर भाव आज कुछ
आल्हादित से हैं, ये
लम्हें यादगार बन जाए
काश…सोच रही हूँ..
ठहर जाए ये वक्त यहीं
उथली पगडंडियों पे चलते
थकते कदमों को जब
मरहम सी छांव मिलेगी
तो तपते गमों को…
हराना आसान सा हो
जाएगा , रूक जाऊं
ठहर जाऊं यहीं कि..
एक आस में पलते और
ढलते ख़्वाब, बेआस
हो, बिख़र न जाएं कहीं
मैं मौन, न जाने कब से
बस उम्मीदों पे जी रही हूँ।

निधि भार्गव मानवी