यादें

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आज फिर से पढ़ रही हूं, मैं पुरानी चिट्ठियाँ.
कर रही महसूस अपने दर्मियाँ ये दूरियाँ..
कैद थी इक वक़्त से, लोगों से जो सहमी डरी.
आज लो आज़ाद कर दी, मन की सारी तितलियाँ.
था अकेला फूल वो जो खिल रहा था ड़ाल पे
जब हवाँ चलती थी उसको, चूमती थी पत्तियाँ.
देख ली सबने तबाही इक पड़ौसी मुल्क़ की.
ऐ खुदा महफूज़ रखना, तू हमारा आशियाँ.
कुछ नये से दर्द लेकर,आ रहीं है जिंदगीं.
बढ़ रही है आप से जो, ये मिरी नज़दीकियाँ.
कर गये कुर्बान अपनी जान ,जो इस देश पर
इश्क़ माँटी से जिन्हें था, वो अजब थी हस्तियाँ.
तुम” मनी” को आजमाना चाहते हो तो सुनों.
जीत लेगी हँस के वो मन है बहुत सी ख़ूबियाँ
मनीषा जोशी मनी..

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