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हाशिए

सुनो दोस्त
हाशिए पर चलना छोड़ो
तलाशों अपनी राहें
दिल की सुनो
और मौका मिलते ही
निकल भागो
कहीं दूर
जहां महसूस कर सको
खुद के पंख
ताजी हवाएं
अपनी मचलती धड़कने
कुम्हलाएँ ख्वाबों को
फिर से सींचने
आरजुओं की कश्ती को
दिल के दरिया में
फिर से आज़ाद बहाने को
क्योंकि आज़ादी से बेहतर कुछ नही
चाहे वो खयालों की हो
या अधिकारों की
तो उठो, दौड़ो, चलो..
जहाँ के ख्वाब छुपा लिए सबसे
जहाँ की ख्वाहिशें घोंट दी तुमने
सुनो दोस्त
हाशियों पर चलना छोड़ो
तपती है दोपहर
और शामें
थकन लिए
जैसे रूह थका देती हैं
गाँव पुकारता है तुम्हे
पगडंडियों सी बाहें फैलाएं
हरियाली कि गोद में
महकती खुशबू लिए
तुम्हारे बचपन की मिठास
से भरी
गांव की बोलियां
पुकारतीं हैं तुम्हे
सुनो दोस्त खुद को टटोलो
और चलो
उन पुरानी राहों पर
शायद वो मिल जाए
जिसे तुम छोड़ आए थे
बरसों पहले
तुम्हारा खोया सुकून,
कोई पुराना साथी,
कोई भूली कहानी
या कोई अपना
सुनो दोस्त।
हाशिए पर चलना छोड़ो…

सिम्मी हसन
बालियाँ, यूपी