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भारत के बहुत सारे गाँवों को मिला कर नये शहर के रूप में विकसित किया जा सकता है- अशोक बालियान

राजसत्ता पोस्ट

भारत के बहुत सारे गाँवों को मिला कर नये शहर के रूप में विकसित किया जा सकता है।- अशोक बालियान, चेयरमैन,पीजेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन

हमने अपनी ब्राज़ील यात्रा में देखा था कि वहाँ की सरकार ने सभी गावं में सुविधा न होने पर कुछ गावों को उठा कर उन्हें एक साथ बसाया और उन्हें सभी सुविधाए उपलब्ध करायी। मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है। योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल भारत में लगभग 27 लाख लोग गांव छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं।


शहरीकरण विकास का एक सूचक होते हुए भी कई तरह की समस्याओं का जन्मदाता भी है। इसमें पीने के पानी से लेकर सीवरेज, यातायात, आवास की समस्या गंभीर है। अब सवाल उठता है कि भारत में नये गावं बसाने के लिए शून्य से शुरूआत करने की परिकल्पना करनी होगी। भारत उनतीस राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों का एक संघ है। भारत 1.27 अरब की जनसंख्या के साथ विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। भारत के पास विश्व की कुल भूक्षेत्र का 2.4% भाग है, लेकिन यह विश्व की 17% जनसंख्या का निवास स्थान है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोगों का गांवों से शहरों की और पलायन जारी है। इस देश को नए शहर चाहिए, ताकि उन करोड़ों लोगों को वहाँ जगह दी जा सके।


भारत में 638,365 गांवों हैं। और इनके आकार में काफी अंतर है। भारत के 236,004 गांवों में 500 की आबादी है, और 3,976 गांवों में 10,000 की आबादी है। साल 2011 के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश में छोटे बड़े कुल मिलाकर 5161 शहर हैं और साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में 100 नए स्मार्ट शहर बसाने की बात कही थी। क्योंकि आज नए शहर बसने से रोजगार में भी वृद्घि होगी इसका कोई तार्किक या सांख्यिकीय आधार नहीं है। नए शहर आवास की समस्या को तो कम कर सकते हैं लेकिन रोजगार के लिए घंटों की दूरी प्रतिदिन तय करना आम आदमी के लिए मुश्किल भरा काम है। बढ़ती आबादी और बढ़ते वाहनों के दबाव के आगे मेट्रो शहरों की यातायात व्यवस्था भी पूरी तरह से चरमरा गई है।
हमारा मानना हैं कि अगर छोटे शहरों व् गावं में ही औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर उन्हें स्मार्ट शहर में तब्दील कर दिया जाए तो इससे विकास को गति भी मिलेगी और लोगों का पलायन भी रुकेगा। एक शहर को पांच से सात किलोमीटर रेडिअस के मूल में बसे रहना चाहिए उसके चारो और बीस से पच्चीस किलोमीटर के घेरे में कुछ गावों को उठा कर उन्हें एक साथ नये स्वरुप में पुन: निर्मित करना चाहिए।
आयरलैंड के गांवों अक्सर बहुत विचित्र है और आमतौर पर चौराहे पर स्थित है। पिछले 4-5 दशकों में तेज़ी से आर्थिक विकास होने से ब्राजील का समाज भी तेजी से बदला है। वर्ष 1940 तक ब्राज़ील मुख्यतः एक ग्रामीण, कृषि-प्रधान समाज था, जिसकी लगभग 68 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती थी। परन्तु वर्तमान में 17 प्रतिशत जनसंख्या ही ग्रामीण क्षत्रों में है। ब्राज़ील ने भी कुछ गावों को उठा कर एक साथ बसाया है। हमारे देश में भी इस आबादी भी सीधी कतारों में बसाया जा सकता है।
हमारे देश में खाद्यान्न, फल व सब्जियों के समुचित प्रसंस्करण के अभाव में हर वर्ष 55,000 करोड़ रुपयों से अधिक का उत्पाद नष्ट हो जाता है। हमारे देश में अभी भी 2 प्रतिशत फल व सब्जियों की ही डिब्बाबंदी की जाती है जो ब्राजील जैसे देश में 70 प्रतिशत के करीब होती है। ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेड की उपलब्धता 2.3 है, परन्तु भारत में यह आंकड़ा केवल 0.7 को छू पाता है।


भारत के बहुत सारे गाँवों को मिला कर विकसित किया जा सकता है। जहाँ पर विविध् समुदायों के लिए अवसरों और स्थानों का प्रबंध् भी हो। इस प्रकार, बहुत सारे गाँवों को मिला लेने से दूर तक फैली अल्प सघन आबादी शहर बन जाएगी।केंद्र सरकार को पूरे देश में नगर नियोजन का कार्यभार अपने हाथों में लेना चाहिए। इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सेवाओं जैसे शिक्षा, चिकित्सा, टेलीफोन, मोबाइल सेवा, सड़क, बैंक, बिजली और पानी जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं का विस्तार होगा। सरकारी व गैर-सरकारी क्षेत्रों में खुलने वाले इंजीनियरिंग, मेडिकल व दूसरे कालेज ग्रामीण क्षेत्रों में भी खुले जायेंगे।
परिणामस्वरूप शहरो के इर्द-गिर्द स्थित गाँवों की जगह बहुत सारे नए उपशहरी इलाकों बन जायेंगे। केंद्र व् राज्य सरकार की गाँवों और खेती के साथ नए शहरों के निर्माण पर तवज्जो होनी चाहिए, ताकि आर्थिक उन्नति हो और लोगों का विकास हो। अब सवाल है की वर्ष 2030 में क्या अधिकतर भारतीय 6 लाख छोटे गाँवों में केवल पर्याप्त खेती कर रहे होंगे या वे 600 नियोजित, चमचमाते शहरों में (या एक लाख जनसंख्या वाले 6000 शहरों में ही) कृषि-इतर क्षेत्रों में भी काम कर के अच्छा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन जी रहे होंगे? हमारा भविष्य इस पर निर्भर है कि हम अपने संसाधनों का इस्तेमाल कैसे करते हैं। हमारा संस्था पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन इस सम्बन्ध में भारत सरकार से भी इस योजना पर काम करती रहती है।