Home LyfeStyle पंचमहाभूत तत्वों को चुनौती देती मानव कृत वस्तुएं

पंचमहाभूत तत्वों को चुनौती देती मानव कृत वस्तुएं

हम मनुष्यों ने जानवरों से कुछ अधिक बुद्धि क्या पा ली कि अपने आपको देवता बनाने की होड़ में लग गये। कहने को सामाजिक प्राणी हैं मगर व्यक्तिवादी सोच लिये संकीर्ण हो गये। चले थे हम सभ्य समाज का निर्माण करने मगर कभी ठहरकर यह भी ना सोचा कि सभ्यता के विकास में सृष्टि के सौंदर्य को ही निगल गये।

सभ्यता का प्रारम्भ शायद तब ही हुआ होगा जब मनुष्यों को अपने रूप पर गुमान हुआ होगा। हया ने पत्तों को तोड़ अपना वस्त्र बनाया होगा। तन को ढक स्त्री- पुरूष ने सार्वजनिक स्थल त्याग एकांत में सहवास किया होगा। धीरे धीरे स्वयं की संवेदनाओं को महसूस किया होगा। जानवरों से अलग स्वयं को ऊपर उठाते हुए सभ्य समाज का निर्माण करने के लिये अथाह प्रयास किया होगा!

हजारों वर्षों से बढ़ते हुए हम कहाँ आ गये हैं! कर्मेंद्रियों (हाथ, पैर, मुख, प्रजननेंद्रिय व मलनिष्कासनेंद्रिय) का उपयोग करते हुए हम सृष्टि के साथ विकास करते आये हैं। विकास करते हुए हमने अपनी ज्ञानेंद्रियों (चक्षु, घ्राण, श्रौत, त्वक और रसना) का भरपूर उपयोग किया। परिणामस्वरूप इसके सुख के लिये हमने अनेक अविष्कार किये। धीरे ज्ञानेंद्रियाँ हमारी भौतिकवादी जीवन शैली का अधिक विकास करने लगीं। हम सभ्य बनने चले थे भौतिक सुखों में लिप्त हो गये। वर्तमान समय में हमने अपनी जीवन शैली को सृष्टि के नियमित जीवन से इतना ज्यादा बदल लिया है कि निजी हित के लिये सृष्टि को भी आहत करने से नहीं चूकते!

सृष्टि की रचना का मूल स्वरूप पंचमहाभूत तत्वों में छिपा है। जल, थल, अग्नि, वायू और आकाश। हम मनुष्य जल को दूषित कर चुके हैं। कारण हम सभी जानते हैं। माना कि फैक्ट्रियों की आवश्यकता है। मगर यह कहाँ लिखा है कि उनके कूड़े कैमिकल को जल में ही बहाया जाये! क्यों नहीं दूरगामी परिणाम सोचकर कोई कार्य किया जाता है। क्या साठ दशक पूर्व कभी किसी ने सोचा था कि भारत में जल का सकंट इतना ज्यादा गहरा जायेगा! शहरों में बिना आर.ओ/ फिल्टर के पानी पीना मुश्किल है। विभिन्न तरीके की नई नई मशीनों का बाजारीकरण हो गया है। अगर शुद्ध जल चाहिये तो पानी शुद्ध करने की मशीन लगवाईये। सचमुच हमने कितना विकास किया है! अपने देश की स्वच्छ गंगा जल को दूषित करके अविष्कृत मशीन से उसे स्वच्छ किया है।

वायू सृष्टि की अनमोल धरोहर है। जिसका मोल हमें तब पता चल रहा है जब हम उसे दूषित कर चुके हैं। आखिर क्या करेंगे हम ऐसे विकास का जिसमें हम सांस ही ना ले सके। सांस भी लें तो इतना दूषित कि फेफड़े ही खराब हो जायें। चेहरे से घूँघट हटाने की बात जो किया करते थे अब शहर में वो चेहरा ढककर चला करते हैं। गाँव घूघँट/ मास्क विहीन है क्योंकि वहाँ इतनी तरक्की अभी नहीं हुई है, तनिक सभ्यता बची है। अधिकांश छोटे बड़े शहरों की आवोहवा में घुटन भर गयी है। विकास की सभ्यता ने अंगों के वस्त्र तो कम कर दिये हैं मगर चेहरे ढक दिये हैं।

थल को अनजाने में हमारी खेती ने काफी नुकसान पहुँचाया है। अधिक से अधिक अनाज उगाने हेतु जमकर कैमिकल का दुरुपयोग हुआ है। पोलिथिन. प्लास्टिक, मोबाईल जैसे कई टन कचरों को जलाकर हमारी भूमि प्रदूषित होती जा रही है। भूमि में कचरा गाड़ देने से भी तो जमीन बर्बाद होती ही है। अग्नि, आकाश भी मनुष्यों द्द्वारा उत्पादित दूषित हवाओं से नहीं बचेंगे। क्या हम सृष्टि के पंचमहाभूतों में से किसी को भी स्वच्छ नहीं रहने देंगे? आखिर हमारे विकास की गति दूसरों के अहित में क्यों होती है। काश! कि हम दूरगामी परिणामों को देखते हुए आज की सोच रख पाते!…

लेखिका / कवयित्री: संगीता कुमारी

नरोरा एटॉमिक पावर स्टेशन, टाउन शिप, बुलंदशहर