चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का 86वा जन्मदिन और किसान आंदोलन का गौरवमयी इतिहास – अशोक बालियान

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आज दिनांक 06-10-2021 को देश के किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का 86 वा जन्म दिन (जन्म 6 अक्तूबर 1935) मनाया जा रहा है। किसानों की मुश्किलों के लिए वह जिंदगी भर संघर्ष करते रहे। भारत एक कृषि प्रधान देश है। और भारत में किसान आन्दोलन को चौधरी टिकैत ने एक नई दिशा दी थी ।

मुझे चौधरी टिकैत के साथ अपनी पुस्तक “किसान आन्दोलन में चौधरी टिकैत की भूमिका” लिखने के समय काम करने का अवसर मिला। वह बेहद सरल और ईमानदार किसान नेता थे। चौधरी टिकैत के समय अनेक बार सरकार को किसान की चोखट पर सिसोली आना पड़ता था। अस्‍सी के दशक में जब किसानों का उत्पीडन चरम पर था। उसी समय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार, बिजली के दाम में बढ़ोतरी और किसानों को उनकी फसलों का मूल्य न मिलने के खिलाफ एक गैर-राजनैतिक किसान आंदोलन खड़ा हुआ था।

चौ. टिकैत के नेतृत्‍व में महाराष्ट्र में विश्व बैंक से लौटे शरद जोशी, कर्नाटक में लॉ के प्रोफेसर प्रो. नजुन्डा स्वामी, पंजाब में अजमेर सिंह लखोवाल व् भूपेन्द्र सिंह मान, हरियाणा में घासीराम नैन व् प्रेम सिंह दहिया और गुजरात में विपिन देसाई ने किसान आंदोलनों को मजबूत करने का काम किया था।

पश्चिमी यूपी से के सिसौली कस्‍बे से टिकैत के रूप में उठी किसानों की आवाज को सरकारी स्तर पर दबाने के तमाम प्रयास किये गए,लेकिन ठेठ स्‍वभाव और बुलंद हौसले के धनी चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने सिसौली से लेकर दिल्‍ली तक किसानों को आवाज को सुनने के लिए सरकारों को मजबूर कर दिया था।

चौधरी टिकैत ने 27 जनवरी 1988 को मेरठ कमिश्नरी पर ऐतिहासिक आन्दोलन करने के बाद चौ. किसानों की आवाज को दिल्ली के हुक्मरानों तक पहुंचाने के लिए दिल्ली में किसान पंचायत की घोषणा की थी।25 अक्टूबर 1988 को कई लाख किसानों के साथ चौ. टिकैत ने नई दिल्‍ली के वोट क्लब पर किसान महापंचायत का आयोजन किया।

अगर चौधरी टिकैत के संघर्ष को गौर से देखें तो पाएंगे कि उनके आंदोलन का मुख्य मुद्दा फसलों के वाजिब दाम और मंडी व्यवस्था में किसानों को बिचोलियों से बचाना था।

विभिन्न मंचों एवं आन्दोलन के माध्यम से चौधरी टिकैत जीवन पर्यन्त किसानों के इस महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाते रहे। उनका कहना था कि देश में कृषि उत्पाद को किसान लागत मूल्य से कम कीमत पर बिचोलियों को बेचने को मजबूर रहते है।

भारतीय राजनीति के शिखर पर चौधरी टिकैत का उदय अस्सी के दशक में हुआ था। उत्तर प्रदेश में बिजली की दरों पर श्री वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को झुका कर टिकैत ने अपना सिक्का जमाया था।

चौधरी टिकैत का ठेंठ गंवई व्यक्तित्व और किसी भी दबाव या लालच से ऊपर रहने की उनकी क्षमता से बने व्यक्तित्व ने 1988 में बोट क्लब पर हुए ऐतिहासिक धरने को संभव बनाया था। कुछ दिन के लिए ही सही, ऐसा लगा जैसे ‘भारत’ ने ‘इंडिया’ को उसकी औकात बता दी हो।

अस्सी के दशक के तमाम किसान आंदोलनों के चरमोत्कर्ष का प्रतीक बना यह धरना भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ था। किसान आंदोलन की इस दशा की पड़ताल करने पर हम चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन से सीखते है कि वह आन्दोलन मुख्य रूप से खेती की लागत और उपज के मूल्य के सवालों पर केंद्रित था।

चौधरी टिकैत और भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने दलगत राजनीति से दूरी बनाये रखी थी। चौधरी टिकैत जनता के बीच से आए थे, और अंतिम समय (15मई 2011) तक जनता के बीच रहे।

चौधरी टिकैत अंतिम समय तक खेती से भी जुड़े रहे। चौधरी टिकैत ने अपने अपने ठेठ देसी अंदाज और सहज व्यवहार से करीब डेढ़ दशक में किसानों को बड़ी ताकत दी थी।

चौधरी टिकैत के जीवन का उद्देश्य किसानों को इतना जागरूक करना था कि किसान की आवाज भी हुक्मरानों तक पहुंच सके। और उन्होंने भारत की किसान राजनीति में कृषक नेताओं की भूमिका मजबूती से रेखांकित कर दी थी।इस अवसर पर हम उन्हें नमन करते है।

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