Home कविता/शायरी जब सत्य आया समक्ष पांडवों के

जब सत्य आया समक्ष पांडवों के

जब सत्य आया समक्ष पांडवों के
राधेय नहीं कौन्तेय कर्ण है।
मानो गिर पड़ा अर्जुन का गांडीव भूमि पर
जेष्ठ भ्राता के वद्ध का बोझ आ गया कांधे पर
जीवन भर सुत पुत्र राधेय का अपमान हुआ
मृत्यु के पश्चात सूर्य पुत्र कौन्तेय का सम्मान हुआ।
ये श्री कृष्ण ने भी क्या खूब किया
भाई के ही हाथों भाई का वद्ध करवा दिया
ये कुरु वंश की मर्यादा ना मेरे समझ आई
कुल वधू के चीर हरण पर महापुरुषों ने थी आंख झुकाई
वाह रे भरत वंश तूने भी क्या खूब मर्यादा निभाई।

धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा और शकुनी के प्रतिशोध ने
गांधारी को पुत्र विहीन किया
सौ सौ पुत्र होने पर भी कोख सुनी होने का दुख दिया
कुरु वंश के सौ सौ हरे भरे वृक्षों को काट दिया
धृतराष्ट्र की नेत्र विहीनता ने उसे कर्म विहिन कर दिया
राजा भरत के त्याग को धूमिल कर दिया
देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञा को कलंकित कर दिया
भरत वंश के वंशजों ने क्या खूब मर्यादा का निर्वहन किया।

पांडवों के साथ बार बार अन्याय किया
लाक्षागृह से द्यूत क्रीड़ा तक सब में षड्यंत्र किया
माना कि गलती थी धर्मराज युधिष्ठिर की भी
जो द्रौपदी को दांव पर लगा दिया
द्रौपदी नहीं थी उनके अकेले की
वह तो थी पांचों पांडवों की
और फिर नारी कोई वस्तु तो नहीं जो दांव पर लगाई जाए
वह तो शक्ति है जो पूजी जाए।।

 

कवयित्री: दीक्षा त्रिपाठी