Home कविता/शायरी पनीला इंतज़ार

पनीला इंतज़ार

बूढ़ी आंखों में पनीला इंतजार
कब आंसू बनकर बह जाता है।
पता नहीं लगता..
खामोश पपड़ाएं होंठ
बुदबुदाते रहते हैं
अक्सर वो नाम जो कभी
रिश्ते हुआ करते थे
मुद्दत हो चुकी है
बांहों को मखमली गर्माहट मिले
मासूम किलकारियाँ अब
कानों में सन्नाटा बन कर
गूंजती हैं, अपनेपन के
निवालों से पेट भरे
ऐसा लगता है सदियां
बीत चुकी, चश्मे से
झांकती आंखों को
चहलपहल तो नज़र आती है
पर अपना कोई नहीं
सुबह से रात रात से दिन
रेत की तरह फिसल जातें हैं
वक्त गुज़रता रहता है पर
आस नहीं टूटती
ये मोह, जर्जर काया में जैसे
फिर प्राण फूंक देता है पर
नहीं पिघलता तो बस
औलादों का पाषाण हृदय
कैसे, किस तरह कर देते हैं वो
अपने जन्म दाताओं को
वृद्धाश्रम के हवाले?
धिक्कार है।

निधि भार्गव मानवी