“अकेलापन” अकेलापन है…

राह अपने आप को पाने की …जहां से हम निकल चुके ,वहां वापस आने की…!

अकेलेपन से बढ़कर आनंद नहीं, आराम नहीं …, स्वर्ग है वह एकांत जहां शोर नहीं, धूमधाम नहीं…! देश और काल के प्रसार में, शून्यता – अशब्दता अपार में…! चांद जब घूमता है कौन सुख पाता है…! खुले नीले आकाश में, चकोरी की निगाह में, चांद जब चमकता है, कौन सुख पाता है…! भेद यह मेरी समझ में तब आता है…,होती हूं जब मैं अपने निश्छल मन के प्रांत में…,और तभी समझ पाती हूं…, पेड़ झूमता है किस मोद मे, खड़ा हुआ एकाकी पर्वत की गोद में, बहती पवन मंद मंद है…! पत्तियों के हिलने में छंद है …! कैसी भीनी-भीनी मीठी सुगंध है ,कैसी शांति, कैसा आनंद है..! इस अनुभूति से जो दुखी हैं… वृत्तियां उनकी निश्चय ही बहिर्मुखी हैं़़़़़!!!

✍️डॉ स्वाति (कशिश )

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