Home उत्तर प्रदेश स्वर्गीय बाबू गेंदा सिंह किसानों और गरीबों के सच्चे हितैषी थे।

स्वर्गीय बाबू गेंदा सिंह किसानों और गरीबों के सच्चे हितैषी थे।

राजसत्ता पोस्ट

स्वर्गीय बाबू गेंदा सिंह जी की पुण्यतिथि पर विशेष

13 नवम्बर को बाबू गेंदा सिंह जी की जन्मतिथि थी।कुछ समय बाबूसाहब के सम्बन्ध में कुछ जानकारियाँ एकत्रित करने में गुजरा। इनमे से कुछ जानकारियाँ यहाँ साझा कर रहा हु। संभव है आप में से कुछ अग्रजों के लिए ये जानकारियाँ नई नहीं होंगी, आप से निवेदन है कि लेख को पढ़े और कोई तथ्यात्मक त्रुटि हो तो सूचित करे।

आप लोग बाबू साहब से जुड़े संस्मरण कमेंट में लिखे इससे नई पीढ़ी के लिए ये जानकारियाँ सुलभ हो सकेंगी।

15 नवम्बर को बाबू गेंदा सिंह जी की पुण्यतिथि है, जनपद में अनेक स्थानों पर उनकी स्मृति में कार्यक्रमों का आयोजन होगा। उनकी पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर इस लेख के माध्यम से श्रद्धांजलि प्रस्तुत है।

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कुछ दशक पहले भारत की राजनीती में किसान नेताओ का दबदबा होता था। जनता की आवाज बुलंद करने के लिए उनके समस्याओं को समझना और निस्तारण के विषय में जानना अनिवार्य है।ऐसे में ग्रामीण परिवेश और देश की नब्ज को समझने वाले किसान नेता राजनीती में अपनी पैठ रखते थे। पहले प्रदेश और फिर केंद्र की राजनीती में अविभाजित देवरिया जनपद की पहचान रहने वाले बाबू गेंदा सिंह भी एक किसान नेता थे।

13 नवंबर 1908 को ग्राम दुमही पो0-बरवा राजा पाकड़ तमकुही कुशीनगर में जन्मे गेंदा सिंह जी ने अपनी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रहण की। युवा गेंदा सिंह अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध चल रहे आंदोलनों से प्रेरित होकर 1921 में कांग्रेस से जुड़े और स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान देते रहे।ब्रितानिया हुकूमत की खिलाफत के कारण मार्च 1941 से दिसंबर 1945 तक ‘पोलिटिकल प्रिजनर’ के रूप में जेल में रहे।

आजादी के बाद सन 1948 में कांग्रेस से मोहभंग हुआ तो सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से 1964 तक जुड़े रहे। इसी बीच 1949-52 में वे उत्तर प्रदेश सोशलिस्ट पार्टी के जोनल सेक्रेटरी पद पर भी रहे।स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गेंदा सिंह 1952 मे पहली बार सोशलिस्ट पार्टी से सेवरही के विधायक चुने गये| 1957 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से दुबारा विधायक चुने गये उस चुनाव में देवरिया की सभी सीटो पर पार्टी के विधायक चुने जाने पर उन्हे नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।

अप्रैल 1964 में बाबू साहब की कांग्रेस में वापसी हुई, विधायकी बरकरार रही और अब बाबू साहब गन्ना किसानो के नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे। नेता प्रतिपक्ष के बाद अब वक्त था सत्ता में भागीदारी और लालबत्ती मिलने का।कांग्रेस में आने के बाद सत्ता भी मिली और लाल बत्ती भी लेकिन बाबूसाहब का व्यावहार नहीं बदला। जमीन से जुड़े बाबू गेंदा सिंह मंत्री बनने के बाद भी सामान्य जीवन यापन करते रहे। सत्ता और लालबत्ती की हनक ने उन्हें अपनी जनता और किसानो से अलग नहीं किया। 1965 से 1967 तक कृषि और पशुपालन मंत्री रहते हुए कृषि एवं वन के सम्बन्ध में जानकारी लेने 1966 में इन्हे जर्मनी जाने का अवसर मिला। 1967 में चौथी बार विधायक बने तो PWD और 1970 में सूचना मंत्रालय में मंत्री पद मिला।

सेवरही से चार बार के विधायक, विधानसभा में विपक्ष के नेता और काबीना रहे बाबूसाहब की राजनैतिक कद और बढ़ना था।सेवरही से लगातार 20 साल लखनऊ पहुँचने के बाद अब दिल्ली की बारी थी। सन 1971 में बाबूसाहब पडरौना की लोकसभा सीट से दिल्ली पहुँचे। संसद के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और 15 नवम्बर 1977 को देश ने अपना एक महान निष्ठावान एवं समर्पित प्रथम गन्ना किसान नेता खो दिया।

बाबू गेंदा सिंह किसानों और गरीबों के सच्चे हितैषी थे। उनका पूरा जीवन समाज के प्रति समर्पित रहा है। क्षेत्र में विश्व स्तर के गन्ना शोध संस्थान, बकरी फार्म, रेशम फार्म, मसाला फार्म और सब्जी अनुसंधान केंद्र सब बाबू गेंदा सिंह की ही देन है। किसानों की लाइफ लाइन कही जाने वाली नहर प्रणाली भी उन्हीं की देन है।

-विश्वजीत शेखर राय