आशा का दीपक
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जब तलक़ है चाँद तारे इस गगन में..


तब तलक़ मन मे जले दीपक हमारे..


है कठिन ये दौर जिसमें रश्मियाँ भी..


इस तमस से हार कर बैठी किनारे...


ये घड़ी भी काट लेगे मिल के हम सब..


ये समय भी न रहेगा बीच धारे...जब .....


भर तो जायेंगे समय के लेप से ये..


फिर भी गहरे घाँव है ये संग रहेंगे..


किन्तु जीवन इस तरह ही चल रहा है.


देखते है हम भी कितना संग चलेंगे..


इस धरा पर वक्त पूरा हो गया तो.


उस गगन पे हम दिखेंगे बन के तारे....जब....


धैर्य से है काटना नाज़ुक़ पलों को..


नेह से है बाँधना इन साँकलों को...


बंद द्वारों मे भले बैठे है हम पर..


थामनी है मन की सारी हलचलों को..


है अगम माना समय की चाल जिसमे.


हौसलो से पार करने है किनारे ..


जब तलक है चाँद तारे इस गगन मे......             

तब तलक मन मे जले दीपक हमारे..


✍️मनीषा जोशी

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