Home धार्मिक कन्हैयास्थान अपने नाम के अनुरूप ही पावन एवं मनोरम है।

कन्हैयास्थान अपने नाम के अनुरूप ही पावन एवं मनोरम है।

कन्हैयास्थान
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भारत विविधताओं से परिपूर्ण भौगोलिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त होने की वज़ह से समूचे विश्व में अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।संपूर्ण विश्व के पर्यटकों के लिए पर्यटन हेतु विभिन्न राष्ट्रों के मध्य भारत एक पसंदीदा राष्ट्र में से एक है।

भारत का झारखंड राज्य सुंदर झरनों,पहाड़ों,पठारों,नदियों एवं वन्य प्रदेशों से परिपूर्ण खूबसूरत पर्यटन स्थलों एवं आदिवासियों से सम्बंधित अनूठा क्षेत्र है। नैसर्गिक अप्रतिम सौंदर्य के कारण झारखंड प्रसिद्ध राज्यों में से एक है। यह क्षेत्र विविधताओं से युक्त भाषाओं, विभिन्न संस्कृतियों,धर्मों एवं रीति रिवाजों वाला क्षेत्र है।इस क्षेत्र के आदिवासियों की अनूठी जीवनशैली हमेशा से जिज्ञासा का विषय भी रही हैं। जिनमें उनकी विविधातापूर्ण रीति रिवाज़ सदैव पर्यटकों को आकर्षित करते आए हैं।

आधुनिकता एवं तकनीकियों के निरंतर विकास से मानवनिर्मित पर्यटन स्थलों की संख्याओं में भी दिनप्रतिदिन वृद्धि हुई है और हो रही है।

झारखंड में काफी खूबसूरत एवं ऐतिहासिक पर्यटन स्थल हैं और उनमें साहिबगंज जिला के अंतर्गत राजमहल अनुमंडल में स्थित कन्हैयास्थान स्वयं में अद्भुत,मनोरम एवं महत्वपूर्ण है।

राजमहल गंगा नदी के दाएँ किनारे पर स्थित एक छोटा-सा शहर है जो ऐतिहासिक रूप से अति महत्वपूर्ण है। राजा मानसिंह एवं अकबर के जनरल ने १५९२ में बंगाल की राजधानी राजमहल को बनाया था। प्राचीन राजमहलों,मस्ज़िदों,मकबरा एवं कई ऐतिहासिक भवनों के अवशेष व स्मारक राजमहल एवं इसके आस-पास के क्षेत्रों में हैं।

गंगा नदी के किनारे स्थित कन्हैयास्थान एक गाँव है।
परन्तु,श्रीकृष्ण की लीलाओं से सम्बंधित स्थान होने के कारण विश्व प्रसिद्ध है एवं कृष्णभक्त यहाँ सालभर आते रहते हैं। श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था इस्कॉन ने कन्हैयास्थान में एक भव्य मंदिर का निर्माण करावाया,जिसके परिणामस्वरूप यह स्थान कृष्णभक्तों के लिए पसंदीदा पर्यटन स्थल के संग अध्यात्म एवं श्रद्धा से सम्बंधित स्थान भी है। इस्कॉन से युक्त होने के कारण विदेशी पर्यटकों का भी यहाँ आना-जाना लगा रहता है।

ऐसी मान्यता है कि चैतन्य महाप्रभु एक बार बंगाल से वृंदावन जाने के दौरान यहाँ रुके थे और भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन उन्हें प्राप्त हुए थे। चैतन्य महाप्रभु के पदचिन्ह यहाँ भी संरक्षित हैं।कन्हैयास्थान में आज भी भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के पदचिन्ह विद्यमान हैं।

ऐतिहासिक कथाओं एवं मान्यताओं के अनुसार
लगभग ४०० वर्षों पूर्व एक धार्मिक आंदोलन चला गया था और उस काल को भक्तिकाल कहा गया। भक्तिकाल में कई संतों ने हिन्दू धर्म को पुनर्स्थापित करने का भरसक प्रयास किया। उन्हीं में से चैतन्य महाप्रभु भी एक थे।

महाप्रभु का जन्म बंगाल के नवद्वीप नामक गाँव में सन् १४८६ में हुआ था। वे मात्र २४ वर्ष की उम्र में ही गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास ग्रहण किए। बंगाल से वृंदावन की यात्रा के दौरान चैतन्य महाप्रभु कई स्थानों पर रुके और वहाँ कृष्णभक्ति का प्रचार किए।इन्हीं यात्राओं के दौरान वे झारखंड के एक गाँव में रुके थे और वहीं पर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण और उनकी रासलीला के साक्षात दर्शन हुए थे। यह गाँव ही आज कन्हैयास्थान नाम से कृष्णभक्तों के मध्य विश्व प्रसिद्ध है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार कन्हैयास्थान को गुप्त वृंदावन भी कहा जाता है। उत्तरप्रदेश में मथुरा के पास स्थित वृंदावन के अलावा श्रीकृष्ण से सम्बंधित एक और कथा एवं मान्यता है कि भारत में एक और वृंदावन भी है। जहाँ द्वापरयुग में नहीं,बल्कि कलयुग में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त चैतन्य महाप्रभु को दिखाने के लिए एकबार गुप्त रूप से रासलीला किए थे और वह स्थान कन्हैयास्थान ही है,जिसे ‘गुप्त वृंदावन’ के नाम
से भी जाना जाता है।

पर्यटन मात्र खुशियों के क्षण हेतु ही महत्वपूर्ण नहीं है,अपितु यह किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक,सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विकास हेतु उपयोगी सिद्ध होता आया है और महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता आया है। वर्तमान में कई देशों की अर्थव्यवस्था पर्यटन उद्योग की परिधि में ही घूमती है। हमारे देश भारत के पर्यटन स्थल अनूठे ही नहीं बल्कि ज्ञानवर्धक भी हैं और उनमें से कन्हैयास्थान अपने नाम के अनुरूप ही पावन एवं मनोरम है,जो स्वतः ही सभी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है और करता रहेगा ।

शावर भकत”भवानी”
कोलकाता