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जीवन की आशा

आशाओं की नींव पर,

जो ख्वाब बनते हैं।

न जानें एक पल में ही,

कितनी बार गिरते हैं।

क्या समाज आशाओं की,

कदर नहीं करता।

क्या स्वार्थ के कारन इन्सां,

इंसान नहीं रहता।

क्या उसका अहम् उस पर,

इस कदर हावी है।

कि नहीं उसको ये गोचर,

अंत उसका भी तो भावी है।

खैर, छोडो इसकी चिंता,

चलो नई बात करें।

आज अपने इस कलम से,

एक नई शुरुआत करें।

चिंता नहीं समाज को,

चिंतन की दरकार है।

क्यों निर्बल को कहता है कोई,

“सह लो” देखता करतार है।

लें  शपथ हम आज की,

बल निर्बल को दे देंगे।

प्रधान सेवक की भांति,

गोद उनको हम ले लेंगे।

स्नेहा पांडेय