कैसे भूले वो दिन प्यारे ,जब हम भी बच्चे कहलाते थे ।

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कैसे भूले वो दिन
कैसे भूले वो दिन प्यारे ,जब हम भी बच्चे कहलाते थे ।
हर ओर राज चलता था अपना,घर के राजकुमार कहलाते थे ।।
दादी माँ के राजदुलारे , दादा जी के कुंवर थे हम ।
माताजी के हम थे कान्हा, और दीदी के बन्दर हम ।।
बैठ कर पाया के कांधे पर , हम कितना इतराते थे ।
कैसे भूलें वो दिन ……………
देर सुबह तक सोकर उठते ,चिंता मुक्त घूमते फिरते ।
दिल जो चाहता , वो हम करते
जिद पूरी होने पर , हम फूले नही समाते थे ।
कैसे भूलें वो दिन ……………
कभी खींचते छोटी की चोटी,कभी उसकी किताबे छिपाते थे।
गुस्सा हो जब वो पीछे -पीछे भागे,हम उसको खूब चिढ़ाते थे ।
कर कर के हम यूँ शैतानी, खूब हँसते ओर मुस्काते थे ।।
कैसे भूलें वो दिन ……………
कभी हुए जो पापा गुस्सा , दादी के पल्लू में छिप जाते थे ।
सुनते थे हर रोज नई कहानी, तब हम सोने जाते थे ।
पर आते ही नाम पढ़ाई का , हम झट से सो जाते थे ।।
कैसे भूलें वो दिन ……………
कभीं झगड़ते, कभी थे लड़ते ,हम तो अपने यारो से ।
कभी मानते,कभी रूठते,हम अपने दिलदारो से ।
पर उनके बिन एक पल भी,हम तो न रह पाते थे ।।
कैसे भूलें वो दिन ……………
आज ढूंढता फिरता दर दर मै उन सच्चे दिलदारो को ।
संग हँसे और संग थे रोये , उन दिल के सच्चे यारो को ।।
संग रहते थे खिले-खिले हम, दूर होते ही मुरझाते थे ।
कैसे भूलें वो दिन ……………
बेशक़ छोटी उम्र थी हम सब की ,पर दिल बड़ा हम रखते थे।
हर छोटे और बड़े से, दिल से मोहब्बत करते थे ।।
बाँटकर आपस मे छोटी-छोटी खुशियां, हम बेहद खुश हो जाते थे ।
कैसे भूलें वो दिन ……………
न चालकी, न होशियारी, हम अपने मन मे रखते थे ।
गन्दे को गन्दा कहने का, हम दिल मे साहस रखते थे ।
धोखा और मक्कारी से दूर , हम तो केवल प्यार अपनाते थे ।
कैसे भूलें वो दिन ……………
लौटा दो हे प्रभु फिरसे, बचपन के वो प्यारे दिन ।
झूठ, बुराई, नफरत से दूर ,ढेरों खुशियों वाले दिन ।।
‘सरल’ को फिर से तू लौटा दे , माँ के आंचल में सो जाने वाले दिन।
कैसे भूलें वो दिन …….. सौरभ “सरल”

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