चालीस पार की गृहस्थ औरतें..
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गृहस्थ औरतें पिजरें की कोई सुंदर चिडियाँ जैसी होती हैं. जिन्हें सुख सुविधा भोजन तो मिलता है मगर उड़ने की आज़ादी नहीं .फिर भी अकेली नहीं होती होते है साथ घर के बुजुर्ग छोटे बच्चे जो घूमते रहते है उनके आस पास जिम्मेदारियों के रूप में .. व्यस्थ रहती है वो बीस पच्चीस साल जिम्मेदारियों की डोर थाम मगर अपनी पीड़ा अपनी परेशानी मे हरदम खुद को पाती हैं अकेला..  धीरे धीरे उम्र की दहलीज़ को पार करते करते जिम्मेदारियाँ संभालती हुई न जाने कब पार कर लेती है  बीस पच्चीस साल और बन जाती है उस परिवार की नींव जिसके कंघों पर टिका होता है पूरा परिवार ...सारे सदस्य ..जिसको हर बात पे पुकार कर मजबूत बनाते है रिश्ते उस नींव की तरह जिसे तराई कर पक्का बनाता है एक मजदूर.. वक्त के साथ बच्चे बड़े हो जाते है बुजुर्ग बूढें या फिर कभी कभी छोड़ जाते है अकेला और रह जाती हैं घर में चालीस पार की अकेली गृहस्थ औरतें कुछ अपने अस्तित्व की खोज में नये प्रयास करती हुई कुछ कुढ़ती हुई कुछ घबराई सी कुछ बीमारियों से भरी कुछ पछताई सी कुछ चिड़चिडी .. मगर अकेली चालीस पार की गृहस्थ औरतें..
मनीषा जोशी मनी..

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