खुशी

उसने कहा- बेवजह ही_
ख़ुश क्यों हो ?_
मैंने कहा- हर वक्त दुखी
भी क्यों रहूँ।

उसने कहा- जीवन में
बहुत ग़म है।
मैंने कहा -गौर से देख,
ख़ुशियाँ भी कहाँ कम हैं?

उसने तंज़ किया –
ज्यादा हँस मत,
नज़र लग जाएगी।
मेरा ठहाका बोला-
हंसमुख हूँ,
फिसल जाएगी।

उसने कहा- नहीं होता
क्या तनाव कभी?
मैंने जवाब दिया- ऐसा
तो कहा नहीं!

उसकी हैरानी बोली-
फिर भी यह हँसी?
मैंने कहा-डाल ली आदत
हर घड़ी मुसकुराने की!

उसने फिर तंज़ किया-अच्छा!
बनावटी हँसी…इसीलिए
परेशानी दिखती नहीं।
मैंने कहा-
अटूट विश्वास है,
प्रभु मेरे साथ है,
फिर चिंता-परेशानी की
क्या औकात है?

कोई मुझसे “मैं दुखी हूँ”
सुनने को बेताब था,
इसलिए प्रश्नों का
सिलसिला भी
बेहिसाब था…

उसने पूछा – कभी तो
छलकते होंगे आँसू?
मैंने कहा-अपनी
मुस्कुराहटों से बाँध
बना लेती हूँ।
अपनी हँसी कम पड़े तो
कुछ और लोगों को
हँसा देती हूँ।

कुछ बिखरी ज़िंदगियों में
उम्मीदें जगा देती हूँ।
यह मेरी मुस्कुराहटें
दुआऐं हैं उन सबकी
जिन्हें मैंने तब बाँटा,
जब मेरे पास भी कमी थी।
उमा मिश्रा (पितांबरी)

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