Home स्पेशल Birthday special: सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव सेवा की प्रतिमूर्ति थे

Birthday special: सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव सेवा की प्रतिमूर्ति थे

सिख के दूसरे गुरु अंगद देव जी का जन्म वर्ष 1504 में ‘मत्ते नांगे की सराय’ नामक गांव में हुआ था l वर्तमान में यह गांव पंजाब का जिला मुक्तसर में पड़ता है। गुरु जी के पिता का नाम भाई फेरुमलजी और माता का नाम बीबी सभराई था। बचपन में उनका नाम ‘लहिणा’ था। परिवार के अन्य लोगों की तरह उन्होंने व्यापार करना आरंभ कर दिया। भाई लहिणा हर वर्ष माता वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए जाया करते थे। 1532 में एक बार इसी तरह वापसी में भाई लहिणा ने करतारपुर साहिब में श्री गुरु नानक देव जी के दर्शन किए। भाई लहिणा गुरु नानक देव जी से इतने प्रभावित हुए कि उसी समय गुरु जी के शिष्य बन गए। 1532 से 1539 तक सात वर्षों तक भाई लहिणा ने बड़े समर्पित भाव से गुरु की सेवा की।  अमीर परिवार के होने के बावजूद वे लंगर के लिए पानी ढोना, लकड़ी चीरना, पंखा झलना, खेती करना आदि जैसे कार्य करते थे l

आपको बता दें कि सिख इतिहास में भाई लहिणा के सेवा कार्य के अनेक प्रसंग हैं। कई उदाहरण हैं, जो भाई लहिणा के निष्काम सेवा भाव को प्रकट करते हैं। इसीलिए ज्योतिजोत समाते समय गुरु नानक देव जी ने भाई लहिणा को गले से लगाया और कहा कि ‘तू मेरे अंग जैसा है, इसलिए तू आज से अंगद कहलाएगा।’ इस प्रकार भाई लहिणा गुरु अंगद देव जी बन गए।

वहीं, गुरु जी ने गुरु नानक देव जी द्वारा एकत्र की गई संतों-भक्तों की वाणी को लिखवा कर गुटके और पोथियां भी तैयार करवाईं। इन्होंने गुरु नानक देव जी की जन्म साखियां भी लिखवाईं और एक प्रकार से सिख इतिहास लेखन परंपरा को जन्म दिया। इन सभी कामों के लिए एक समर्थ लिपि की जरूरत थी, जो गुरुमुखी लिपि के निर्माण से पूरी हुई। गुरुजी ने बच्चों को गुरुमुखी लिपि सिखाने के लिए पाठशालाएं भी खोलीं और बाल-बोध भी तैयार करवाए। आपको बता दें कि गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु अंगद देव जी के 62 श्लोक शामिल हैं, जो मनुष्य को निष्काम भाव से सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।

नानक देव जी ने जब अपने उत्तराधिकारी को नियुक्त करने का विचार किया तब अपने पुत्रों सहित लहणा यानी अंगद देव जी की कठिन परीक्षाएं ली।

परीक्षा में गुरू नानक देव जी के पुत्र असफल रहे, केवल गुरू भक्ति की भावना से ओत-प्रोत अंगद देव जी ही परीक्षा में सफल रहे।

नानक देव ने पहली परीक्षा में कीचड़ के ढे़र से लथपथ घास फूस की गठरी अंगद देव जी को सिर पर उठाने के लिए कहा।

दूसरी परीक्षा में नानक देव ने धर्मशाला में मरी हुई चुहिया को उठाकर बाहर फेंकने के लिए कहा। उन दिनों यह काम केवल शूद्र किया करते थे।

जात-पात की परवाह किये बिना अंगद देव ने चुहिया को धर्मशाला से उठाकर बाहर फेंक दिया।

तीसरी परीक्षा में गुरू नानक देव जी ने मैले के ढ़ेर से कटोरा निकालने के लिए कहा। नानक देव के दोनों पुत्रों ने ऐसे करने से इंकार कर दिया जबकि अंगद देव जी गुरू की आज्ञा मानकर इस कार्य के लिए सहर्ष तैयार हो गये।

चौथी परीक्षा के लिए नानक देव जी ने सर्दी के मौसम में आधी रात को धर्मशाला की टूटी दीवार बनाने की हुक्म दिया, अंगद देव जी इसके लिए भी तत्काल तैयार हो गये।

पांचवी परीक्षा में गुरु नानक देव ने सर्दी की रात में कपड़े धोने का हुक्म दिया। सर्दी के मौसम में रावी नदी के किनारे जाकर इन्होंने आधी रात को ही कपड़े धोना शुरू कर दिया।

छठी परीक्षा में नानक देव ने अंगद देव की बुद्धि और आध्यात्मिक योग्यता की जांच की। एक रात नानक देव ने अंगद देव से पूछा कि कितनी रात बीत चुकी है।

अंगद देव ने उत्तर दिया परमेश्वर की जितनी रात बितनी थी बीत गयी। जितनी बाकी रहनी चाहिये उतनी ही बची है।

इस उत्तर को सुनकर गुरु नानक देव समझ गये कि उनकी अध्यात्मिक अवस्था चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। सातवीं परीक्षा लेने के लिए नानक देव जी अंगद देव को शमशान ले गये।

शमशान में एक मुर्दे को देखकर नानक देव ने कहा कि तुम्हें इसे खाना है, अंगद देव इसके लिए भी तैयार हो गये।

तब नानक देव ने अंगद को अपने सीने से लगा लिया और अंगद देव को अपना उत्तराधिकारी बना लिया।