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ग़ज़ल

निधि भार्गव मानवी

मोहब्बत के अँधे सफ़र में घिरी हूँ
मुझे थाम लो मैं भँवर में घिरी हूँ

चली हूँ किधर भी उठाकर कदम मैं
लगा आपकी रहगुज़र में घिरी हूँ

वो बचपन जो दिल से न भूला कभी भी
मैं अब तक उसी के नगर में घिरी हूँ

ज़माने में भरती हूँ परवाज़ लेकिन
ये सच है कि अपने दहर में घिरी हूँ

मेरे लब पे है नाम अब तक तुम्हारा
मैं अब तक तुम्हारे असर में घिरी हूँ

मुहब्बत के सावन बिताये बहुत से
मगर वक्त की दोपहर में घिरी हूँ

निधि ये समर्पण मैं कैसे बताऊँ
मैं इक मुस्कुराते सहर में घिरी हूँ