Home राजनीति अतीत का खौफ दिखा कर भविष्य की राजनीति

अतीत का खौफ दिखा कर भविष्य की राजनीति

सर्वविदित है कि बिहार का अतीत बहुत सुखद नहीं रहा है विशेषकर 1990 से 2005 तक का जिसे अमूनन जंगलराज के तौर पर चिन्हित किया जाता है। आज की प्रौढ़ पीढ़ी ने तब सबसे ज्यादा दंश झेला था। आज का प्रौढ़ पीढ़ी तब युवा था। उसे रोजगार की तलाश थी, जिन्हे रोजगार नहीं मिल रही थी एवं जो थोड़े भी आर्थिक रूप से सक्षम थे वह अपना व्यापार करने की तरफ उन्मुख होना चाहते थे। ठीक उसी वक्त प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय के नाम पर आरक्षण की नई व्यवस्था समाज के सामने लाकर सामाजिक ताने-बने को दो धडे में बाँट दिया, एक ऐसी खाई जो कभी मिटी ही नहीं। यहाँ राजनयिक एवं प्रसिद्ध पत्रकार स्व। कुलदीप नैयर की एक युक्ति का वर्णन करना बहुत ही समीचीन होगा। कुलदीप नैयर ने कहा था शायद आने वाले दशकों में कभी आरक्षण व्यवस्था समाप्त भी हो जाए, पर इस व्यवस्था से उभरी अगड़ी-पिछड़ी की भावना जो हमारे मन में पैठ गयी वह अब कभी नहीं समाप्त होगी।

90 के दशक में जब देश के सभी राज्य उदारीकरण के नये संभावनाओं पर अपने-अपने राज्यों के विकाश में जुट गए थे तब उत्तर भारत के दो प्रमुख राज्य जातीय ध्रुवीकरण में जुटी हुई थी। खासकर बिहार। अपहरण ने एक उद्योग का दर्जा प्राप्त कर लिया था बिहार में। लूट-पाट, छीना-झपटी आम दिनचर्या की बात बन चुकी थी। थाना-प्रभारी जाति विशेष के पदस्थापित होने लगे थे। पुलिस के पास कार्यवाई के लिए दर्ज की गई सूचना को प्राथमिकी या प्रथम सूचना रिपोर्ट (F I R) नहीं दर्ज किये जाते थे। मामलों का निपटारा पैसों के माध्यम से थाने के बाहर ही निपटा लेने के लिए बाध्य कर दिया जाता था।

अपहरण उद्योग अपने चरम पर थी, बच्चे सबसे सॉफ्ट टारगेट बने हुए थे उस उद्योग के। बच्चे घर सही-सलामत घर आ गए तो लगता था कि आज का दिन कट गया। ज्यादातर अभिभावक खुद ही अपने कामों को छोड़कर बच्चों को स्कूल से लाना चाहते थे। एक छोटी सी घटना मैं आपको बताना चाहता हूँ जो मैंने महसूस किया था। दिसंबर का महिना था और हल्की हल्की ठंड पड़ रही थी, सुबह का 6.30 हो रहा था। मैं अपने बेटे को छोड़ने उसे अपने बाइक से उसके स्कूल जा रहा था। घर से थोड़ी ही दूरी तय करने के बाद मुझे सामने से आती हुई एक बलेरो या उसी तरह की कोई गाड़ी रही होगी दिखी जिसपर तीन चार देहाती टाइप के लोग गर्दन पर गमछी रखे हुए बैठे थे, जो मुझे संदेहस्पद लग रहे थे। मैं तेजी अपनी बाइक को लेकर सामने जो भी घर दिखा उसके गेट में चलती हुई बाइक की गति को बढ़ा कर धक्के मार कर घुस गया बिना किसी संकोच के कि घर वाला क्या कहेगा या डाँटेगा……भय के इस माहौल में हमलोगों ने अपने समय को बिताया है। यह किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि क्या माहौल रहा था बिहार का। हर बिहारी के जेहन में सब कुछ आज भी जस की तस चित्रित है। नीतीश की सरकार ने इस जटिल समस्या से बिहार वासियों को निजात दिलाया यह भी आज बतलाने की जरूरत नहीं है। आज का माहौल ही इस बात को खुद ब खुद प्रमाणित करती है। इसका गुणगान कर वे खुद को हल्का करते हैं।

अपहरण उद्योग से जुड़ी एक रोचक जानकारी आपलोगों के साथ साझा करता हूँ, जिससे अधिकतर लोग अनभिज्ञ ही होंगे कि कैसे और क्यूँ अपहरण उद्योग ने बिहार में ही सबसे ज्यादा अपना विस्तार पाया है। आजादी के कुछ समय पहले की बात है तब यहाँ एक भारतीय व्यक्ति इंपीरियल पुलिस(I. P.) में पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त थे, जिनके अधिकार क्षेत्र में चंपारण का भूभाग पड़ता था। उस वक्त उस क्षेत्र में एक अपराधी ने पुलिस के नाक में दम कर रखा था जिससे उनकी छवि खराब हो रही थी लगातार। तब उन्होंने उस अपराधी को समझाया कि तुम जो इन अपराधों के चलते खुद की जान भी संकट में डालते हो, इससे अच्छा तो यह है कि तुम व्यक्ति का अपहरण कर लो और उससे फिरौती के रूप में पैसे ले लिया करो। और यहीं से अपहरण उद्योग की नीव पड़ गयी।

तेजस्वी यादव जो दस लाख नौकरी की आज बात कर रहे हैं उन्ही लालू प्रसाद के सुपुत्र है जिनके पिता मुख्यमंत्री रहते हुए अपने सरकारी कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलने कहा करते थे, वेतन नईखे मिलत बा त गांधी मैदान में जा के चिनिया बदाम बेच….अ। कोई कुछ नहीं भुला है। पलायन जिस राज्य की नियति बन गयी थी चाहे भय के माहौल के कारण हो या फिर ढहती हुई शिक्षा व्यवस्था के के कारण।

व्यक्तिगत तौर पर मुझे पलायन से उतना दुख नहीं हुआ, जितना कि इस बात से दुख हुआ कि जो बच्चे अच्छी शिक्षा के लिए बिहार से बाहर गए उसे वापस लाने में नीतीश कुमार की सरकार भी न तो सफल रही न ही कोई सार्थक प्रयाश ही किया, जिसके कारण बिहार और ज्यादा पिछड़ता गया।

15 वर्षों तक अनवरत बिहार की सत्ता में बैठी सरकार विकास से हटकर, अतीत के खौफ पर ही ज्यादा से ज्यादा चर्चा कर रही है। पहले हमला सीधे लालू यादव और उनके शासन का नाम लेकर हो रहा था, अब लालू का नाम तो नहीं है लेकिन हमला तल्ख, सीधा और आक्रामक होता जा रहा है। इस हमले की जद में सीधे-सीधे तेजस्वी यादव हैं। कई बार नाम लेकर, कई बार बिना नाम लिए हुए। कहना न होगा कि लड़ाई जिस तरह तल्ख और सीधी हुई है, वह अब तेजस्वी बनाम नीतीश के साथ ही शायद नरेंद्र मोदी भी हो चुकी हैं। कहना मतलब कि ‘उस खानदान के चाहिए कि एनडीए का पूरा प्रचार ही उस अतीत का खौफ दिखाने के इर्द-गिर्द घूम रहा है, तेजस्वी को जंगलराज का युवराज बताया जा रहा है तो वहीं राजद के लिए – किडनैपिंग इंडस्ट्री का कॉपीराइट इन्हीं लोगों के पास है। जिस अतीत का आज के वोटर के एक बड़े वर्ग को पता ही नहीं है।`

प्रधानमंत्री जी यदि जंगलराज की बात करते हैं तब तो यह जायज है क्यूंकि बिहार के शासन में कभी भी राजद के साथ उनका सहयोग नहीं रहा है और भविष्य में भी शायद ही कभी हो, हालांकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। पर नीतीश कुमार को जंगल राज कहने का कोई नैतिक आधार नहीं है। क्यूंकि यही जंगलराज का युवराज 2015 में उनका न सिर्फ सहयोगी था बल्कि उप मुख्यमंत्री भी रहा है। और कल क्या करेंगे यह कोई नहीं जानता है।

तकाजा तो यह है कि नीतीश कुमार को सार्वजनिक मंचों से यह उद्घोष करना चाहिए था कि मैं जनता-जनार्दन का ऋणी हूँ कि आपने मुझे अनवरत 15 वर्षों तक बिहार कि सत्ता के शीर्ष पर आसीन रखा, यदि फिर मुझे आपने मौका दिया तो फिर से कुछ नया कुछ श्रेष्ठ करने का प्रयास करूंगा। और यदि मेरी वापसी नहीं भी होती है तो भी बिहार की जनता इस बात से निर्भीक रहे कि कोई भी आपराधिक छवि का कोई शरारती तत्व आपके साथ किसी प्रकार का कोई शरारत करने की बात भी सोच सकेगा क्यूंकि विगत 15 वर्षों के शासन में मैंने तंत्र को इतना मजबूत कर दिया है कि आपको किसी भी तरह का भय नहीं होना चाहिए। क्या कभी सुना है किसी ने कि सेना का कोई नया जेनेरल आ गया तो सिपाही मनमौजी हो गए। वहाँ पर भी एक सिस्टम काम कर रही है। व्यवजूद इसके नीतीश कुमार अपनी विकाश की बात बताने की जगह जंगलराज की बात याद दिला रहे हैं। आपका जो योगदान है वह चिरस्मरणीय है माननीय मुख्यमंत्री जी, वह आपको बतलाने की आवश्यकता नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखती है।

निशाने पर जिस तरह नई और तेजी से उभरती लीडरशिप आई है, वह चिंता की बात है। तेजस्वी या चिराग नहीं, उस युवा नेतृत्व को खारिज करने की प्रवृति है, जो ‘युवराज’ जैसे जुमले के रूप में कभी राहुल गांधी और अब तेजस्वी यादव के लिए सुनाई दे रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि तेजस्वी को मौका मिलना चाहिए। पर मेरा एक सवाल है कि आप किसी के सोच को महज इसलिए कैसे खारिज कर सकते हैं कि उसके पिता से कभी कोई गलती हुई थी! आप उसके सोच का तार्किक जवाब क्‍यों नहीं देते ?’

फिलहाल बिहार की राजनीति अतीत के खौफ बनाम भविष्य की उम्मीद के दो खांचों में बंट चुकी है। ‘उस खौफ को जिसे आज की युवा पीढ़ी ने देखा ही नहीं, उस पर क्‍यों थोपा जा रहा।’ रोजगार पर बातें क्यूँ नहीं की जा रही हैं। “नौकरी की बात को पहले खिल्ली उड़ाकर खारिज किया, फिर कहा कि पैसा कहां से लाओगे, जेल से और अब कह रहे कि नौकरी तो तब मिलेगी जब कोई कम्पनी यहां आएगी। उसके लिए भी भौगोलिक कारकों को दोषी बतलाया जा रहा है जिसके कारण यहाँ निवेश नहीं हो रहा है। नोएडा, गुरुग्राम भी समुद्र के किनारे नहीं बसे हुए शहर हैं। बेरोजगारी का दंश झेल रहे जिस युवा पीढ़ी के घाव पर मरहम लगाने की जरूरत थी, उस दंश को इस सारी जुमलेबाजी ने गहरा ही किया है।

दूसरे चरण के चुनाव के ठीक पहले अपनी पारंपरिक मुद्दे पर नीतीश मुखर हो गए कि आबादी के हिसाब से हो आरक्षण व्यवस्था; तेजस्वी बोलेः महंगाई तो अब सरकार की भौजाई इन युवाओं की बातों को पहले नीतीश कुमार, फिर सुशील कुमार मोदी और अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन बयानों के आलोक में देखा और पढ़ा जाना चाहिए, जहां 10 लाख नौकरी के वादे पर महागठबंधन, खासतौर से तेजस्वी यादव पर हमले लगातार तल्ख और सीधे होते गए हैं। यह एनडीए की बड़ी रणनीतिक चूक हैं। ‘जिस तरह पूरी एनडीए ने सारी ऊर्जा एक खानदान की नींव खोदने में लगाई, उसकी आधी भी ऊर्जा अगर अपनी किसी योजना को स्टैब्लिश करने में लगाई होती तो शायद आज जमीन पर कुछ और दिख रहा होता। ऐसे हमले बताते हैं कि एनडीए की राजनीति जमीन से काफी ऊपर के सच पर चल रही है, जमीन के अंदर का उसे अहसास ही नहीं है।’ आज अगर लड़ाई सीधे तेजस्वी बनाम “पूरी एनडीए’ हो गई है जो कभी मोदी बनाम विपक्ष हुआ करता था तो इसका सारा श्रेय खुद एनडीए को है, जिसके आला नेताओं ने पुरानी नींव खोदने के चक्कर में अपनी ही कमजोर पड़ चुकी नींव और जर्जर कर ली।

पहले राष्ट्रवाद आजमाया, फिर जंगलराज के बहाने हमलावर हुए और कुछ विकास की बातें भी हुईं, लेकिन दूसरा चरण आते-आते राष्ट्रवाद से तो किनारा पहले ही हो गया था, जंगलराज में पिता के कारनाम पुत्र पर थोपने के बहाने सीधे हमले शुरू हुए। 10 लाख नौकरी के वादे पर “नौकरी बेचने’ तक की बातें करके नरेटिव बदलने की कोशिश भी हुई। एनडीए से यह चूक कमोबेश बार-बार हुई।

समझना होगा कि जिस दौर में आप ये बातें कर रहे हैं, उस दौर की बड़ी जमात के सामने ‘सुशासन’ की छवि तो है, लेकिन ‘जंगलराज’ की कहानी उसके लिए सिर्फ सुनी-सुनाई है।’ समझना होगा कि आज का पढ़ा-लिखा बेरोजगार युवा पीढ़ी “लॉलीपॉप वायदों’ से आकर्षित नहीं होगा। फौरी राहत भी उसे नहीं चाहिए। आज वह अपनी समस्याओं का स्थाई समाधान चाहता है। सनद रहे कि तेजी से बदलते इस दौर में परिवार के बड़े फैसले अब आमतौर पर यही वर्ग लेता है।

नीरज कृष्ण जी की ✍🏻 से