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फॉरेस्ट कर्मचािरयों को जंगल संरक्षित करने के लिए ग्रामीणों का मिला साथ, हरी हो गई धरा

अल्मोड़ा: हर बरसात में लाखों खर्च कर लाखों की संख्या में ही पौधरोपण। इसके बावजूद हिमालयी राज्य का वनाच्छादित क्षेत्रफल आगे बढऩे के बजाय 45 फीसद पर सिमट गया है। जंगलात का अंधाधुंध दोहन, उस पर वनाग्नि मिश्रित वन क्षेत्रों को तबाह कर रही तो जैव विविधता भी खत्म होती जा रही। दूसरी ओर विभाग के ही कुछ कर्मचारियों एवं वन पंचायतों की मेहनत व ईमानदारी से खालिस चीड़ के जंगल में बहुपयोगी बांज, काफल व झाड़ी प्रजाति के घिंघारू आदि प्रजातियां विस्तार लेने लगी हैं।

वर्ष 2013-14 में मजखाली अल्मोड़ा हाईवे पर कठपुडिय़ा से कूछ दूर कयाला वन पंचायत (हवालबाग ब्लॉक) में चीड़ के एकछत्र राज को कम करने के लिए मिश्रित वन विकसित करने का खाका खींचा गया। प्रयोग के तौर पर पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में पर्यावरण संरक्षण में सहायक करीब 5500 चौड़ी पत्ती प्रजाति के बांज आदि पौधे लगाए गए। इनमें चार हजार से अधिक पौध सूखी धरा को हरा भरा कर रहे हैं।

ग्रामीण को स्वरोजगार भी मिला

सरपंच रघुवर सिंह ने मवेशियों से नई पौध को बचाने के लिए हथबंदी करा दी। गांव के ही आनंद सिंह रौतेला को मानदेय पर पहरेदार रखा गया। वह बताते हैं कि इसमें तीन वर्ष पूर्व यहां तैनात वन विभाग के बीट अधिकारी धीरेंद्र सजवाण का भी बड़ा योगदान रहा। व स्वरोजगार मिला तो आनंद सिंह ने बखूबी जिम्मेदारी निभाई। अब पांच साल बाद अब ताड़ीखेत के बजीना की तरह कयाला में भी चीड़ बहुल जंगल में बहुपयोगी पौधों का मिश्रित संसार ईमानदारी से हरियाली लाने की प्रेरणा दे रहा।

प्रधान कयाला नरेंद्र सिंह, सरपंच कुरचौन दीप कांडपाल, जिपं सदस्य वीरेंद्र सिंह शाही, गजेंद्र सिंह के साथ ही डिप्टी रेंजर नितीश तिवारी, वन दरोगा डूंगर सिंह कैड़ा आदि। कयाला वन पंचायत के सरपंच रघुवीर सिंह ने बताया कि कयाला वन पंचायत के चीड़ से भरे जंगल में चौड़ी पत्ती प्रजाति के पौधे डेढ़ से दो फुट के हो गए हैं। वन पंचायतों के ग्रामीणों के सहयोग से यहां हम हरियाली लाने में सफल रहे। यदि ईमानदारी से ग्रामीणों को साथ लेकर काम किया जाए तो निश्चित तौर जंगलों को आग से बचाने तथा लगाए गए पौधों की सुरक्षा कर पर्यावरण सरंक्षण में हाथ बंटाया जा सकता है।