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“पाँच नन्हे पिल्ले”

पाँच नन्हें पिल्ले …
मेरी तरफ दौड़े,
थोड़े नटखट, नादान
प्यार से भरे,
और मैं भागी
उनसे बचने के लिए
क्योंकि इबादतों के लिए
होना चाहिए पवित्र
जिसका अपना मानदण्ड है
और उनसे बचने की जुगत में
मैं जिस मिट्टी के ढेर पर चढ़ी,
वो भरक गया…
कुछ इस तरह जैसे
अचानक भरभरा जाए रेत
और मैं
फुटबाल की तरह
पटकनियाँ खाती
लुढ़कती गयी दूर तक
जब तक चित्त न हुई
और जब उठी तो
हैरान
की इतनी पटकनियाँ
तो बचपन मे भी नहीं खाई
और इतनी दूर आई कैसे
चूँकि दिमाग सो था उस दम
तो बस इतना याद है
चढ़ी तो मिट्टी के ढेर पर ही थी
खैर
हड्डियाँ सलामत हैं
शुक्र
पर अब तो मैं खेल ही सकती थी
पिल्लों से
क्योंकि मापदण्ड तो टूट चुका था
शायद ये दण्ड था
या एक सबक
उन पिल्लों की
आत्मीय भावना को
ठेस पहुंचाने का
पर अब जो साथ थे
मुझे देख देख के हँसते हैं
और मैं भी
खुद के रोलर कोस्टर बन जाने पर।

सिम्मी हसन
(बलिया)