Home कविता/शायरी उम्मीदों के जुगनू

उम्मीदों के जुगनू

मैंने नहीं जड़े ख़्वाबों
में सितारे…
सादा सा सफ़र है
ये मेरा…
कभी अगर लगता
भी है अंधेरा, मैं…
मुस्कुराहटों की रोशनी
से, तय कर लेती हूं रास्ता
उधेड़बुन जिंदगी की
विचलित भी करती है
पर, झटक कर गर्दन…
मैं उम्मीदों के जुगनूं
बटोर लाती हूं…
जोड़ कर हथेलियों को
उस, सर्व शक्तिमान आगे
नतमस्तक हो जाती हूं
पत्ता नहीं हिल पाता..
जिसकी रज़ा मंदी के बिना
सर्वत्र, सर्वव्यापी है वो..
भला, कौन नकार पाया है…
उसकी रहमतों को ?
सृष्टि का पालक है वो
और सुनों, वही तो है…
हमसफ़र, हमसाया मेरा!

✍️निधि भार्गव मानवी