मेरी जिंदगी की लड़ाई

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कोई एक दिन ना सही, पूरे 365 दिन तुम्हारे…. पर…,कोई एक दिन, या उसका एक हिस्सा छोटा सा ही सही, मेरा है…! सारा आकाश तुम्हारा सही… पर …,इसी आकाश की मामूली ही सही… मेरे सर जितनी छांव, मुझ पर भी है..! सारे पहाड़, वन, नदी, बाग, खेत, महल आदि होंगे तुम्हारे… पर …, जिस पर टिक सके पांव, इतनी जमीन मेरी भी है …! सारे उजाले, सारी सताएँ, सारी कायनात, सारे आमोद प्रमोद, व्यंजनों की भरी परात, होगी तुम्हारे पास… पर… श्रम करने के दो हाथ,… एक कटोरी दाल…,एक मुट्ठी भात…, दो रोटी-पत्तों की ही सही…= एक छोटी थाली…, एक गिलास पानी…, और मेरे आराध्य का वह हाथ …,मेरा भी है!!!

✍️ डॉ स्वाति (कशिश)

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