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किसान आंदोलन से दूरी बना रहे यूपी, पंजाब और हरियाणा के किसान एक बड़ी वजह यह भी

नई दिल्ली/गाजियाबाद। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के नेतृत्व में यूपी बॉर्डर पर तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा धरना-प्रदर्शन बेहद फीका पड़ गया है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत और प्रवक्ता राकेश टिकैत समते तमाम दिग्गज किसान नेताओं की उपस्थिति भी अब किसान आंदोलन में जान नहीं डाल पा रही है। इसे कई बार देखा गया है। पिछले बार हुई किसानों की महापंचायत में भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत किसान की घटती भीड़ देखकर मायूस भी हुए थे।

वहीं इस बीच किसान की भीड़ कम होने की एक और बड़ी और अहम वजह सामने आई है। बताया जा रहा है कि ज्यादातर किसान आंदोलनकारी अपनी गेहूं की फसल की कटाई में व्यस्त हैं, ऐसे में उन्होंने आंदोलन से दूरी बना ली है। यह भी कहा जा रहा है कि गर्मी बढ़ने के साथ लू चलने के कारण दिक्कत आनी तय है। सर्दियों में कई किसानों की जान चली गई थी, ऐसे अब चारों बॉर्डर (टीकरी, शाहजहांपुर, सिंघु और गाजीपुर बॉर्डर) पर अब किसान वापस आने के मूड़ में भी नहीं हैं।

गौरतलब है कि 28 नवंबर से यूपी गेट सहित अन्य स्थानों पर धरने पर बैठे कृषि कानून विरोधियों ने शनिवार को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे पर रफ्तार भर रहे वाहनों की राह में भी रोड़ा बनने की कोशिश की है। वो भी उस वक्त जब खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियां किसानों की झोली खुशियों से भरने के लिए तैयार खड़ी हैं। उनकी इस हरकत ने खेत में डटे उन किसानों को मजबूती दी जो 26 जनवरी के बाद कृषि विरोधी आंदोलन में शामिल लोगों को किसान नहीं मान रहे हैं। यही वजह है कि खेतों में कृषि कानून विरोधी आंदोलन से कन्नी काटने वालों की संख्या बढ़ रही है और आंदोलन स्थल पर सन्नाटा पसरता जा रहा है।

वो धरने पर बैठे, हमने खेतों में बहाया पसीना

रईसपुर में गेहूं के खेत में ही मौजूद मधुर चौधरी बताते हैं कि एक तरफ जहां गाजियाबाद के यूपी गेट पर नवंबर से धरना दिया जा रहा है दूसरी तरफ इस दौरान किसानों ने रात-दिन एक कर खेतों में पसीना बहाया और अब उसका फल प्राप्त करने का समय आया है। गेहूं की कटाई होगी तो घर में रुपये आएंगे। इससे जरूरी काम कर सकेंगे, अगर वह भी आंदोलन में जाते तो आज खेत में गेहूं न होता और साल भर आर्थिक तंगी के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता। न केवल किसान बल्कि उन मजदूरों को भी परेशानी झेलनी पड़ती जो गेहूं की कटाई के लिए आते हैं और इससे अपने परिवार के लिए रोजी रोटी का इंतजाम करते हैं।

किसान मधुर चौधरी का यह भी कहना है कि मैं रईसपुर में रहता हूं, आज तक कृषि कानून विरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए नहीं गया हूं। आम लोगों की राह में रुकावट बनने से किसानों का ही नुकसान है।

दीपक (मजदूर) के मुताबिक. किसान परिवार में चार सदस्य हैं। गेहूं की कटाई करने के लिए आया हूं। इससे ही रोजी रोटी का इंतजाम होगा न कि कृषि कानून विरोधियों द्वारा किए जा रहे आंदोलन में शामिल होने से, इसलिए किसी के कहने पर भी कभी वहां नहीं गया।

चोखेलाल (मजदूर) का कहना है कि मेरे परिवार में चार सदस्य हैं, भाई की मौत हो चुकी है। उनके परिवार की भी देखभाल करता हूं। गेहूं काटने से आमदनी होगी और घर खर्च चलेगा।

रोली सिंह (जिला खाद्य विपणन अधिकारी, गाजियाबाद) का कहना है कि  गेहूं की खरीद शुरू हो चुकी है। अब तक 55 किसानों ने 2,560 क्विंटल गेहूं बेचा है। इस बार गेहूं की पैदावार भी अच्छी हुई है। 1.30 लाख क्विंटल क्विंटल का उत्पादन जिले में होने का अनुमान है।

यहां पर बता दें कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में 28 नवंबर से यूपी गेट पर चल रहा धरना रविवार को भी जारी रहा। प्रदर्शनकारियों की घटती संख्या से परेशान नेताओं ने बैठक की। मंगलवार को वैशाखी और बुधवार को बहुजन किसान एकता दिवस मनाने का एलान कर भीड़ जुटाने का दांव खेला।

संयुक्त किसान मोर्चा गाजीपुर के प्रवक्ता जगतार सिंह बाजवा ने कहा कि मंगलवार को यहां जलियांवाला बाग के शहीदों को याद किया जाएगा। वैशाखी का त्योहार मनाया जाएगा। 14 अप्रैल को संविधान बचाओ किसान बहुजन एकता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के किसानों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है।