अस्तित्व

खबरे सुने

जाने क्यों
मुझे उकेर दिया गया था
पत्थर की दीवार पर
हर किसी ने ढूंढी कमियाँ
और अपनी अपनी कोशिशों में
मुझे उतारना चाहा
अपने मानदंडों पर
मैं भी मैं न हो कर
वो बनने की कोशिश में
कितनी कितनी बार टूटी
यहाँ तक कि
मेरे अस्तित्व के
कितने टुकड़े
बिखरते चले गए
ज़र्रे ज़र्रे में
फिर भी लोग
मुझ पर उठाते ही रहे
उंगलियाँ
निकालते ही रहे कमियाँ
और तब
बेबसी के आलम में
जब मैंने खुद को संभाला
तो न जाने कितनी परतें
मेरे वजूद पर
जमतीं चली गईं
और मैं पूरी तरह
मैं न हो कर
कितने टुकड़ों में बिखरी
उस मैं को ढूंढती
जी रही हूँ
खुद को
एक ऐसी मूरत की तरह
जो यूँ टूटती है
की उसका बिखरना भी
लोगों को हैरत में डाल देता है
और रश्क में
क्योंकि मेरा मैं
जो हर ज़र्रे में है
मुस्कुराता रहता है
कहकहे लगाता है
और ढक लेता है हर महरूमी
जिससे लोग डरते हैं
घबराते हैं
और नफरत करते हैं

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