डॉ स्वाति (कशिश) की बेहतरीन प्रस्तुति

अपेक्षा है मुझे … प्रत्युत्तर की ..!..क्यों बनाया मैंने स्वयं को शिलाखंड! …क्यों हृदय को समायोजित कर लिया… एक अभेद्य दुर्ग में! …लौट जाती हैं उस पाषाण से टकराकर… भावनात्मक लहरें! …क्यों द्रवित नहीं करते अब मुझे… अश्रुपूर्ण नेत्र !…क्यों विचलित नहीं करती मुझे …तन्हाई भरी सहर!… कैसे पार पा लिया उस मस्तिष्क एवं ह्रदय के अंतर्द्वंद से!… कैसे क्षत-विक्षत कर हृदय को …विजयश्री का आशीर्वाद दिया मस्तिष्क को… यथार्थ परक जीवन शायद यही है.!.. प्रत्युत्तर भी शायद यही है.!.. जीवन सारांश !!!….

डॉ स्वाति (कशिश)

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