शाश्वत

खुले आसमान की लकीरों पर
ढलता सूरज एक
मौन निमंत्रण दे रहा है,
संध्या के वक्ष पर कालिमा में
उसने संवरती एक दुल्हन का
चित्र अंकित किया है ।

भोर भी उजास से बेफिक्र
भविष्य की नींव रख रही है,
शब्द की संरचना से ओत प्रोत
मन का गजरा महका चुकी है ।
रेत पर व्यथा की अनकही
अनसुनी कथा उकेरती है,

छलावा ख़ुशी का
क्यों सह रही है ? बोध है उसे
साक्षात्कार है ‘सच’ से उसका
फिर भी,
माथे पर बिंदिया दहका कर
‘एक रात’ की सुहागिन
का भरम आज़मा रही है ।
उफ्फ !
अंधियारी सुहागसेज पर
बैठी संकुचायी रात्रि ॥

✒️- श्वेता

Leave A Reply

Your email address will not be published.