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ख़्वाब

हर रात इक ख़्वाब देखती हूँ ,
जहाँ मैं , मैं होती हूँ ,
मैं जो चाहे वो कर सकती हूँ ,
हर एक पल मेरा अपना होता है ,
पर जाने क्यों सहर होते ही
यथार्थ मुझपर हँस कर कहने लगता है ,
सब स्वांग था कल्पना था
और ज़िंदगी सच्चाई से चलती है
तुम्हारे रंगीन ख़्वाब से नही।

पूजा ‘बहार'(नेपाल)