Home उत्तराखंड सब पर भारी, मंत्री जिला प्रभारी धनदा

सब पर भारी, मंत्री जिला प्रभारी धनदा

देहरादून। उत्तराखंड में जिले 13 और मंत्री आठ, मुखियाजी के अलावा। हर जिले के लिए एक प्रभारी मंत्री। साफ है कुछ मंत्रियों को एक से ज्यादा जिलों का प्रभार दिया गया है, लेकिन इसके बंटवारे का पैमाना क्या है, सबके लिए समझना आसान नहीं। आठ मंत्रियों में दो जूनियर हैं, यानी राज्य मंत्री। इनमें धनसिंह रावत, जिन्हें प्यार से धनदा भी पुकारा जाता है, छोटे होने के कारण सबके लाडले हैं। लिहाजा, इन्हें मिला है पूरे चार जिलों का प्रभार। दरअसल, आठ मंत्रियों में से पांच कांग्रेस पृष्ठभूमि के हैं। सतपाल महाराज, हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, यशपाल आर्य और रेखा आर्य। पांचों के पास एक-एक जिले का प्रभार है। भाजपा की रीति-नीति के तीन मंत्री हैं। इनमें धनसिंह के पास चार, तो बाकी दो मंत्रियों मदन कौशिक और अरविंद पांडेय के जिम्मे दो-दो जिले हैं। जनाब, यह सियासी बंटवारे का बड़ा जटिल फार्मूला है, आसानी से सबको समझ नहीं आता।

मंत्रीजी के तेवर और अफसर की विदाई

आखिरकार राज्य मंत्री रेखा आर्य के तल्ख तेवरों का असर सामने आ ही गया। मंत्री खफा थीं ब्यूरोक्रेसी की नाफरमानी से। मामला इस कदर तूल पकड़ा कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जांच के आदेश देने पड़े। दरअसल, महिला सशक्तीकरण व बाल विकास विभाग में आउट सोर्सिंग एजेंसी के चयन को लेकर विभागीय राज्य मंत्री रेखा आर्य और निदेशक वी षणमुगम के बीच विवाद हो गया था। जांच रिपोर्ट आने के बाद षणमुगम से रेखा आर्य के सभी विभाग हटा लिए गए। आगामी विधानसभा सत्र में विपक्ष कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने के मंसूबे बना रही थी, लिहाजा सरकार ने न केवल इस प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया, बल्कि कांग्रेस के हाथ से एक बड़ा मुद्दा भी छीन लिया। मंत्री और अफसर के बीच इस तरह के विवाद सूबे में कोई नई बात नहीं, लेकिन यह पहला मौका रहा, जब बात जांच तक पहुंच गई।

गुपचुप मिले हो, क्या कोई बात है

पिछले हफ्ते भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा चार दिन उत्तराखंड में प्रवास करने पहुंचे। एक दिन हरिद्वार और तीन दिन देहरादून में पार्टी नेताओं के साथ अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर रणनीति पर मंथन किया। यह सब तो ठीक, मगर इसी दौरान तीन मंत्रियों ने उनसे एकांत में मुलाकात क्या कर ली, सत्ता के गलियारों में तमाम कयासों ने मामला गर्मा दिया। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, अरविंद पांडेय, सुबोध उनियाल के अलावा छह-सात विधायकों ने नड्डा से अकेले में मन की बात की। अब बात क्या हुई, यह कोई नहीं जानता, लेकिन कहने वाले इतने आश्वस्त, कि मानों मुलाकात में सशरीर मौजूद हों। दरअसल, इन्हें पुराना चस्का है सूबे में सियासी अस्थिरता में जीने का, लिहाजा इन मुलाकातों को भी तड़का मार इसी से जोड़ दिया। अब मंत्रीजी तो इसे कन्फर्म करेंगे नहीं, इसलिए दून से दिल्ली तक इंटरनेट मीडिया में चिल्लपों मचाने की कोशिश में जुटे पड़े हैं।

कुढ़ते रहो नेताजी, हरदा तो चल दिए

लोकसभा सदस्य, राज्यसभा सदस्य, केंद्र सरकार में मंत्री, फिर मुख्यमंत्री, अब पार्टी संगठन में राष्ट्रीय महासचिव। कुछ समझ आया, चलिए बता देते हैं। ये हैं कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत। आज की तारीख में उत्तराखंड में इनसे ज्यादा बड़ा सियासतदां किसी पार्टी में कोई नहीं। फिलहाल, केंद्र की सियासत में कांग्रेस का भविष्य, कोई भविष्यवक्ता भी नहीं बता सकता। अलबत्ता उत्तराखंड में पिछले 20 साल में चारों विधानसभा चुनाव में सत्ता बदली है, तो इन्हें 2022 के चुनाव में अपने लिए कुछ उम्मीद नजर आ रही है। यह बात अलग है कि इनकी ही पार्टी के नेता तो इन्हें दरबदर करने पर तुले हैं, मगर हरदा ने 2024 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का नारा उछाल, ऐसा तुरुप का पत्ता चल दिया, कि अब इन्हें अगले विधानसभा चुनाव में दरकिनार करने की हालत में सूबाई कांग्रेसी नहीं। कुढ़ते रहिए, हरदा तो अपना झंडा खुद उठाकर मोर्चे पर निकल लिए।