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जानें कहाँ वैदिक मन्त्रों से मिट्टी का बना शिवलिंग की होती है पूजा

भारतीय परंपरा में प्रकृति का विशेष महत्त्व है।भारतीय त्योहार व पूजा पद्धति किसी न किसी रूप से प्रकृति से जुडी है ,परंतु औद्योगिकरण के कारण अधिकतर पूजा त्योहार भी प्रभावित हुए हैं व प्रक्रिति को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं।
परन्तु आज के समय भी कुछ ऐसी पूजा पद्धति है जिससे प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुची है। इसी में से एक है मिथिला में प्रचलित मिट्टी से बने महादेव की पूजा की परंपरा है ,जो कि पूर्णतः प्रकृति से जुड़ी हुई है। चिकनी मिट्टी से शिवलिंग व अन्य आकार के महादेव बनाये जाते हैं, जिनकी संख्या अपने सामर्थ्यानुसार तय किया जाता है, जैसे ५०० ,११०० ,११००० इत्यादि। पूजा अक्षत, बेलपत्र, फूल, जल आदि पूर्णतः प्राकृतिक पदार्थो द्वारा वैदिक मंत्रोचारण के साथ की जाती है।

कुछ साल पहले तक अधिकतर लोगों के घर में प्रतिदिन की जाती थी परंतु जीवन में व्यस्तता व प्रकृति से दूरी बढ़ने के कारण अब प्रतिदिन ये पूजा बहुत कम घरों में की जाती है। परन्तु साल में एक से दो बार बड़े स्तर पर लगभग हर किसी के घर मे की जाती है।महादेव बनाने वाली मिट्टी पवित्र स्थान से लाई जाती है, इस मिट्टी को सान कर आकार देने योग्य बनाई जाती है ।इस कार्य में घर के बड़े बुजुर्ग के साथ -साथ बच्चे भी शामिल होते हैं।इस मिट्टी को गाउँ भर में महादेव बनाने के लिये घर-घर पहुचाई जाती है।

 

पूजा के बाद शिवलिंग को मिट्टी में अथवा किसी जलकुंड में विसर्जित कर दिया जाता हैं, इससे प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचती है।साथ ही साथ समाज में एकजुटता बनी रहती है, चुकि ये पूजा पूरे समाज की सहायता से ही सम्भव हो पाती है। इससे ये भी प्रमाण मिलता है हम अपने घर में ही रह कर महादेव की साधना कर सकते है वो भी प्रकृति द्वारा पदत्त साधन से।