शैतानी सन्तान

अक्टूबर का महिना चल रहा है मौसम न बहुत गर्म है न ही ज्यादा ठंडा । मैं अ toपनी मां शी पिनपिंग के गर्भ से बाहर आने की खुशी में उछल -कूद कर रहा था । मेरे पप्पा मिस्टर टेकियांग मेरे जन्म हेतु काफी उत्साहित थे , क्योंकि मैं अब तक के इतिहास का पहला ऐसा बालक पैदा होने जा रहा था , जिसके बारे में शायद ही किसी ने कभी सोचा हो ।
मेरी मां मेरी लातों से अचानक अपने पेट पर हाथ रखकर हल्का मुस्कुराते हुए पप्पा की तरफ इशारा किया करती मैं अन्दर ही अन्दर दोनों की सारी हरकतें नोट करता था ।
मौसम ने थोड़ी सी आज अंगड़ाई ली है इसीलिए मम्मा-पापा दोनों ऊनी कपड़ों से लबालब ढके हुए हैं मगर मैं साला यहां नंगा ही लेटा रहा ….
आज मम्मा ने कुछ फड़फड़ाते चमगादड़ फुर्तीले चुहे मंगाये हैं , यह इन्हें सबसे पसंदीदा भोजन लगता है , आखिर स्वाद जो बेमिसाल है , जिसे मैं भी इनकी चाटती अंगुलियों से आभास करता हूं। वैसे अक्सर मेरी मम्मा से ज्यादा पप्पा को खाने में कैंचुए , घेंघा, सांप , बिच्छू, केकड़ा , आक्टोपस आदि तमाम जिंदे लाजबाव लगते हैं , मम्मा भी बहुत अलग अंदाज में इनको फ्राई करते हुए बनाती हैं , सबसे पहले इनको गर्मागर्म कड़ाई में जिन्दा डाला जाता है फिर ऊपर से मसालों के साथ ही वैनेगर ,सास आदि से गार्निश किया जाता है और फिर मेरे होमो सैक्सी मम्मा- पप्पा मदिरा के साथ इस डिस का आनंद लेते हैं । इससे दोनों की ठंडी अपना रुप ही बदल देती है और फिर बाहर भी होता वही है जो मेरी स्थिति यहां अन्दर ….
मुझे यह सब देख रास नहीं आता है और मन करता है कि बाहर निकल कर थोड़ा सा इनके बने बनाए मौसम में विघ्न डालूं परन्तु यह अभी सम्भव न था क्योंकि मुझे दरवाजे ही नहीं मिल पा रहे थे। मेरा दम घुटने लगा है यहां खिड़कियां और रोशनदान भी मुझे नसीब नहीं आखिर ऐसी कौन सी सजा मुझे सुनाई गई है समझ नहीं आता , गुस्सा आता है जब ये दोनों 6 बाई 6 के बैड में भी हरकतों से बाज नहीं आते , मैंने ठान लिया आज कि मुझे तुरन्त बाहर जाना होगा , यूं घुट- घुट कर मैं अब नहीं रहुंगा …
अतः दिसम्बर की कड़ाके की ठंड पड़ी है रास्ते सभी बन्द है मैंने जोर से लात मारी सोचा जहां कहीं भी दरवाजा खिड़की आदि एक्जिट के लिए होगा शायद खुल जाय परन्तु कोई असर नहीं हुआ ….
मेरा क्रोध बढ़ता ही जा रहा था मन कर रहा था यदि एक बार मैं आजाद हो जाता तो इस कोठी से भागकर ऐसी तबाही मचाता … ऐसी तबाही मचाता कि मम्मी पप्पा तो क्या पूरी दुनिया देखती रह जाती ।
जब से मैंने प्राण सम्भाला तब से देख रहा हूं कि कैसी आजादी या यूं कहूं कि आवारागर्दी भरा समां बाहर हो गया है । न कोई कानून से डर न किसी व्यवस्था से चहुं ओर मनमर्जी हो रही है ।
एक प्राचीन पण्डित चाणक्य ने जिस सिद्धान्त का जिक्र किया था , मुझे उसकी फिर से आहट सुनाई दे रही है, जो बताते हैं कि मत्स्य न्याय अर्थात जंगल का कानून अतः जब विकार होता है तो मजबूत कमजोर पर हावी होता है ।

सरकार या कानून के शासन के अभाव में, मानव समाज अराजकता की स्थिति में पतित हो जाएगा, और मजबूत कमजोरों को नष्ट कर देगा या उनका शोषण करेगा जैसे कि बड़ी मछली छोटी मछली के साथ करती है। मतलब सरकार का सिद्धांत मनुष्य की जन्मजात भ्रष्टता में विश्वास…और यही सब कुछ होता मैं देख रहा हूं अतः एक एक्शन बहुत जरूरी हो गया है । प्रकृति के अधिकारों का अपनी सुख -समृद्धि, ऐशौआराम के लिए हनन ही नहीं तबाही सी मचा दी है और मनुष्य अपने को मनुष्य नहीं बल्कि एक विचित्र देवता समझने की भूल करने लगा है । उसे मालूम नहीं कि जब अत्याचारों का घड़ा भरेगा तो एक- एक पाप चुकाने के लिए उसे किन- किन पुण्य कर्मों को करना पड़ेगा यह भी तभी सम्भव है यदि प्रकृति उसे मौका देती है तो …

चाणक्य साहब द्वारा वर्णित सिद्धांत प्रस्तावित करता है कि ‘मत्स्य न्याय’ के प्राकृतिक नियम को मानव समाज में संचालित होने से रोकने के लिए सरकार, शासक और कानून आवश्यक हैं। इसलिए वो बताते हैं कि सरकार और कानूनों की आवश्यकता क्यों है। अतः कौटिल्य ‘डंडा’ अर्थात मजबूत अधिकार के महत्व पर जोर देने की बात कह गये ।
खैर अब कौटिल्य साहब तो कहां आयेंगे लेकिन मैं सारी व्यवस्थाएं जल्द ही स्वस्थ करुंगा , शिकागो से सिडनी और केपटाउन से स्टाकहोम तक सभी की क्लास लेने की कोशिश करुंगा ।
वो RTI मफलर मास्टर जिसका प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ग़रीबी रेखा से नीचे उतर रहा है उसको भी मज़ा चखाना है कि कैसा हाल आवाम का बना हुआ है सांस लेना चाहकर भी सांस लेने का मन नहीं…
अतः मैंने लगातार वार पर वार किए मेरे सिर में इतनी चोटें आ गई कि वह सूज गया और इसका आकार ही बदल गया यह एक ऊबड़-खाबड़ बॉल सा हो गया और शायद मम्मा को कुछ आभास हुआ और वह हड़बड़ी में पप्पा को फौरन हिरासत में लेती हुई फौन लगाती हैं …

टरन् टरन् … टरन् टरन्…

फौन उठाते हुए पप्पा कुछ बोले
स्यांग म्यांग च्यांग झ्यांग प्यांग प्यांग

मम्मा इधर से जवाब देती है थोड़ा दर्द भरी आवाज में एक हाथ से पेट दबाकर

निहाओ शिये शिये निहाओ शिये शिये

इतने में मुझे आभास हुआ कि आखिर कुछ तो असर हुआ जरुर है , सोचा दो चार और ट्राई करुं
मैं भी जिद्दी तो बहुत था अतः किया अपना काम जम के , तभी अचानक एक हल्की सी आवाज आई और लगा कि कोई धर्मात्मा मेरे लिए रास्ता बना रहा है …
वैसे यहां धर्मात्मा कोई और नहीं बल्कि डाक्टरों की एक लैब टीम लगी हुई है , मुझे पूरी तरह से बिकसित करने के बाद आखिरकार वह दिन आज आ ही गया कि अब मुझे आजादी मिलने वाली है। परन्तु मम्मा का पेट काटकर मेरा रास्ता बनाया गया इसका मुझे थोड़ा दर्द भी हो रहा है क्योंकि पप्पा तो मजे लेते रहे मम्मा ने नौ माह मुझे अपने पेट पर लादे रखा वह कितना परेशान हुई इस दौरान इस बात को या तो वही जानती है या मैं ।

कभी कभी तो वह रात -रात भर दर्द से कराहती थी , खाना -पीना सब भूल जाती थी परन्तु पप्पा को तो बस एक ही काम करना होता था , बाक़ी इससे उनको क्या फर्क पड़ता कि कोई किस परिस्थिति में है । दर्द तो मुझे भी होता था पप्पा की मौज मस्ती के लिए मुझे भी धक्के खाने पड़ते थे । लेकिन इस सबके बावजूद सबसे ज्यादा दिक्कत मम्मा को होती थी ।
वह कई बार पप्पा से इस बाबत उलछ भी जाती परन्तु होता क्या वही ढाक के तीन पात …
खैर …
आज मैं मुक्त हो गया और मैंने उस डाक्टर के हाथ में जैसे ही पहली उल्टी के साथ चीख पुकार की तो वो हंसने लगा और जस्न मनाने लगा कि वह सफल हो गया ।
परन्तु मैं तो अन्दर से ही ठान कर आया था कि मैं अब किसी की कैद में नहीं रहुंगा । मैं एक ऐसे युग में जन्मा औलाद हूं जहां न मां बाप ने संसार बस सिर्फ और सिर्फ स्वयं के पेट तक आदमी सीमित हो रहा है । अब आदि काल के समान रिश्ते नाते नहीं … यह एक ऐसा दौर है यदि बाप चाहे तो बेटी को भी मां बना दे और वहीं भाई चाहे तो बहन को… प्राकृतिक नियमों को दरकिनार करते हुए हर कार्य आसानी से किया जि रहा है । जिसकी लाठी उसकी ही भैंस । न यहां लाज शर्म और न ही कोई डर बचा । कहा जाता था कि डर या शर्म दो ऐसी चीजें हैं जो हमें अपने कर्तव्यों को पूरा करने हेतु पर्याप्त राह दिखा सकते हैं परन्तु आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्तप्राय प्रजाति की तरह ये दोनों ही नजर नहीं आ रहे हैं।
अतः मैंने देखा कि यहां तो बहुत बड़ा संसार है इतना बड़ा कि जिसकी मैंने भी कभी कल्पना नहीं की थी ।
मैंने सीधे उड़ान भरने का निश्चय किया ।

मैं मम्मा -पप्पा के आंगन में कुछ ही समय रुका
आपको बता दूं कि यह मेरा जन्म स्थान वुहान शहर था जिससे इससे पहले बहुत कम लोग वाकिफ थे , मैं चाहता हूं कि यह मेरे नाम से मशहूर हो इसलिए मैं यहां सबसे पहले घूमा फिरा और अनेक लोगों को अपने साथ ले गया ।
पूरे शहर में अब एक हलचल सी होने लगी है
मम्मा पप्पा मेरे नामकरण की योजना बना रहे हैं और जाने माने ज्योतिषाचार्य पंडित एच ओ बुलाये जाते हैं , पप्पा की डिमांड थी कि हमारा बेटा हमारे कुल के नाम से ही हमारी तरह अपनी पहचान बनाये अतः उन्होंने सी अल्फाबेट सुझाया
उन्हीं के निर्देशानुसार पण्डित जी ने मेरा नाम सी फार कोविड नाईनटीन (जन्मवर्ष) रखा ।

और देखते ही देखते मुझे अनेक लोग जानने लगे
मैं अपने देशवासियों में ही एक कौतूहल का विषय बन गया और इससे मेरे पप्पा के सबसे बड़े मित्र डिस्को डांसर काफी चिढ़ने लगे कि इनका तो बेटा हो गया हमारा नहीं हो पा रहा ।

अरे कौन उन्हें समझाये कि बिना मेहनत के आज के दौर में बाग में पत्ता भी नहीं हिलता खैर …
मुझे लगा कि क्यों न अपने मम्मा पप्पा का नाम रोशन करुं भला इतनी मेहनत से मुश्किल हालातों में हजारों प्रयासों के बाद यह सौभाग्य उन्होंने पाया है अतः मुझे कोई कमी नहीं छोडनी चाहिए ।
अतः मैं सारे पुराने वाद विवाद भूलाकर विश्व भ्रमण पर निकल पड़ा ।
अरे ये क्या मैं जहां जहां भी जाता लोग रास्ते ख़ाली कर देते। मुझे लगता है कि किसी ने मेरे आगमन का घघर नाद पहले ही सुना दिया हो । बड़े से बड़ा ट्रैफिक जाम पुलिस मिनट में ठोक पीट कर साफ़ करने लगी हुई है ।
बेमतलब यहां वहां फुर्र फरर् करने वाले प्रेमी युगल अब बाहर निकलना तो दूर बाहर ताक- झांक भी करने की हिम्मत में नहीं ।

सारी दुनिया का रश्मों रिवाज मुझे पलटकर रखना होगा । हर दिन विदेश हर दिन यात्रा ड्रामा बनाकर रख दिया है । एक पेड़ -पौधा लगाने का नाम नहीं सब डिजिटल बुके भेंट करने में लगे हुए हैं ।
ऐसा पर्यावरण संरक्षण का पाठ सिखाऊंगा कि
इनको पत्ते- पत्ते पर उपस्थित आक्सीजन का महत्व समझ आने लगेगा ।
क्या पढ़ायेंगे वो पाठ स्कूलों में बच्चों को मैं सभी संस्थाओं को ताला लगवा दुंगा , एक व्यापारिक प्रतिष्ठान या यूं कहूं कि दुकान बना दिये हैं स्कूल कालेज , जब कुछ नवाचार अब तक सीखा न पाये तो जाओ घर पर मौज मस्ती करो ।

किड्जी के नाम पर फ्रांबेल व मांटेसरी की पूरी पद्धति को बदनाम कर दिया , बच्चों से उनका बचपन छीन लिया … खेलने कूदने की उम्र में पीठ से खोपड़ियां तक कबाड़ लाद दिया ।
आखिर कब तक यह खेल चलेगा …
मैं जैसे जैसे आगे बढ़ते रहा मेरा कारवां बनता रहा । मैं थोड़ी देर तक तो समझ ही नहीं पाया कि एक नवजात शिशु का इतना भव्य स्वागत अभिनंदन आखिर क्यों ??
बड़े से बड़का और मोटे से छुटका तक मेरे खौफ से हकबका नजर आया ।
फिर अगले ही पल मुझे बहुत गर्व होता कि आखिर बेटा किसका हुं ।
मिनटों में सड़कों से गाड़ियां हट गई
आफिसों से अफसर निकल गये
प्रधान से प्रधानमंत्री तक पूरी दुनिया आत्मसमपर्ण को तैयार नजर आने लगी । मेरा एक इशारा ही मेरी ललकार बनता जा रहा है।
लोग मेरे स्वागत में हाथ साफ करने लगे
जो कभी शौच करने के बाद भी साबुन नहीं लगाते थे । आज सैनेटाइज , डिटाल , यहां तक कि महंगी मदीरा का भी इस्तेमाल करने लगे हैं ।

परन्तु एक बात समझ में नहीं आई कि मेरी शक्ल इतनी बुरी थी कि जो इन्होने अपने चेहरे नकाब में कैद कर लिये या फिर मेरा खौफ इनको इतना मजबूर कर गया कि मेरी डिक्टेटरशिप के आगे सम्पूर्ण विश्व ने घुटने टेक दिए खैर छोड़िए….

अब सभी लोग नियम कानूनों का पालन करने लगे हैं । मैंने पुलिस प्रशासन सभी की नींद हराम कर दी । यही थे ना वो जो चौराहों पर बाईकों में बैठ कर मुबाइल पर गेम खेलने के आदि हो गये थे । और व्यवस्था के नाम पर तुरन्त चालान बनाकर थाने के हवाले जेब गरम कर लेते । खैर छोड़िए

खौफ ही नहीं लोगों ने मेरा भव्य स्वागत भी किया
आज मैं डिस्को डांसर की हवेली तक आ पहुंचा हुं । यहां साहिबा और साहेब मेरे मम्मा-पापा को गालियां देने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं ।
लगे पड़े हैं …
हे प्रभु आप ही समझाइए इनको …
मैं कहां मानने वाला था मैंने यहां भी खूब सारा खाया पिया उद्धम मचाया ।
लिलिपुट वासी जोनाथन स्विफ्ट के गुलिवरस् ट्रैवलस से भी शायद इतना घबराये और डरे होंगे ।
पता है लोग घरों में ही कैद होने लगे । कारोबारी अपना व्यापार छोड़ भाग गये । लोग एक दूसरे से भी डरने लगे। धीरे धीरे मुझे एक आत्मा समझने लगे जैसे कि मेरा अवतार जनता में हो गया हो ।
किसी सामान को तक छूने से गुरेज करने लगे ।
वस्तुएं द्वितीय विश्व युद्ध के परमाणु बमों से भी अधिक डरावनी समझी जाने लगी ।
सभी की जान हथेली पर आ गई ।

तभी अचानक मुझे एक अखबार की हैड लाइन दिखाई दी जिसमें बोल्ड अक्षरों में लिखा था कि डिस्को डांसर ने आज सिनेट में एक आकस्मिक मिटिंग बुलाई है जिसमें उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण फैसले लेने का निश्चय किया है ।
एक ऐसा व्यक्ति जो विश्व भर में अपनी शक्ति का लोहा मनवाता रहा आज वह भी काफी फुसफुसाता नजर आया ।
मुझे भी कुछ अजीब सा लग रहा है कि आज क्या फैसला लिया जाएगा । मैं दिन भर काफी जगह घूमा फिरा जितने भी लोग बाहर सड़कों, गलियों, आफिसों आदि में मिले सबको एकत्र करने में लगा रहा । कोशिश करता रहा कि आज एक बड़ा हिस्सा कवर कर लूं …
डिस्को डांसर ने बहुत सोचने समझने के बाद आखिरकार फैसला सुना ही दिया ।

फराम टू मारो वर्क फ्राम होम

और यही फैसला देखते ही देखते सभी हिस्सों में लागू होने लगा अतः पूरी दुनिया ही आनलाइन टसन में आ गई ।

अरे ये क्या सरकार सेना सभी मेरी शक्ति के सम्मुख नतमस्तक हो गये । मैं हवा में डोलने लगा जो जहां मिलता उसे वहीं से उठाता रहा ।
इसमें डांसर ने भी मेरी बहुत मदद की मेरी सेना में शामिल लोगों के लिए अलग से स्थाई व अस्थाई हवेलियां तैयार की जाने लगी । उनके लिए किसी चीज की दिक्कत न हो सभी सुविधाएं मुहैया कराई गई । जिसमें मुख्यतया सुबह से शाम तक का आहार : आक्सीजन, इंजेक्शन , दवाईयां , आदि …आदि…
वैसे देखा जाए तो मैंने बहुत कुछ बदल दिया एक कहावत याद आने लगी है जब प्राचीन जुलियस सीजर के लिए कहा जाता था कि जिंदे सीजर से भी मरा हुआ सीजर ज्यादा शक्तिशाली है ।
यहां भी कुछ ऐसी ही धारणाएं बनने लगी हैं ।
आज बहुत कम समय में मैंने विश्व बाजार के रुप रंग को ही पलटकर रख दिया है क्यों हुं ना मैं अपने आप में ही एक कौतूहल या यूं कहूं कि चमत्कार ….
अब उधोग -धन्धो ने अपना आवरण चित्र ही बदल दिया है जहां कल तक बर्तन , कपड़ा , हार्डवेयर बनाने के कारखाने थे आज वहां सैनैटाइजर , मास्क , आक्सीजन, सिलेंडर , इंजेक्शन, दवाईयां आदि ने घर कर लिया है ।

अतः इस प्रकार मैं अधिकांश महाद्वीपों पर काबिज हो गया हूं , और अब मैंने थोड़ा और आगे के लिए सोचा अतः अपनी यात्रा उस दिशा की ओर प्रारंभ की जहां आदि काल से लोगों ने नजर बनाई हुई थी । जो अपनी गौरवशाली परंपरा ,सभ्यता, संस्कार, विश्वास, प्रेम और सौहार्द के सामरिक महत्व के लिए अधिकाधिक जाना जाता था । जहां का आदर्श वाक्य ही था “अतिथि देवो भव: ।”
जैसे ही मैंने अपना पहला कदम पुर्तगाली वास्कोडिगामा के पद चिन्हों पर चलते हुए मसालों के सम्राट विजयन जी के साम्राज्य में रखा तो इसकी आहट से इस उपमहाद्वीप के समुद्र तट से मसालों की खुशबू मानों रायसीना हिल्स तक जा पहुंची । और मैंने महसूस किया कि वहां पर बैठा प्रत्येक व्यक्ति जैसे अब अपनी चाय से इलायची को एक बदबू समझने लगा हो ।
अचानक सब रुक सा गया ।

मैं इस पूरे क्षेत्र के भ्रमण पर निकला मैंने एक नहीं अनेकों रुप धारण किये और खूबसूरत हवा और पानी का आनंद लिया । अनेकों लोगों को अपनी सेना में शामिल करते हुए आगे बढ़ा ।

जैसे जैसे मैं आगे बढ़ा तो यहां के सम्राट ने भी अपनी एक आकस्मिक मिटिंग बुलाई और मोटा भाई की अगुवाई में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया । और ज्यादा देरी न करते हुए अपने नियम कानूनों के वचनबद्ध रात करीब आठ बजे यह तय किया गया कि कल शाम समस्त देशवासी नये मेहमान का स्वागत अभिनंदन करंगे । जिसके लिए कुछ नियम एवं शर्तें गोपनीयता के साथ निर्धारित की गई ।

सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय पर जनता ने तुरंत सदैव की भांति अपनी हामी भरते हुए निर्णय का स्वागत किया और मेरे स्वागत की तैयारियों में जुट गए ।
अतः शाम के पांच बजने को हैं उपमहाद्वीप के सम्राट की दिवानी जनता आदेशानुसार और शुभलग्नानुसार अपनी संस्कृति में मेरा भव्य स्वागत अभिनंदन करती है , जो अन्यत्र कहीं मुझे देखने-सुनने को नहीं मिला ।

विशेष रुप से सभी लोगों ने अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए शकं- घंट , व थालियां -तालियां बजाकर साथ में सुन्दर खुशबूदार मोगरा फूलों की धूप अगरबत्ती व दियों की जगमगाहट से स्वागत समारोह को भव्य दरबार लगाकर सम्पन्न किया । जिससे प्रसन्न होकर मैं काफी लम्बे समय तक उपमहाद्वीप में ही रुका रहा ।

मुझे गर्व है कि यहां के अधिकांश लोगों को मैं अपने साम्राज्य में मिला पाने में सफल हुआ ।
अनेक लोगों को जहां मैंने रास्तों से ही उठाया तो वहीं अनेक लोगों ने अपने छोटे मासूम छोटे बच्चों को छोड़कर मेरे सम्मुख आत्मसमर्पण किया । अनेक बच्चे मां के स्तनों को चूसते -चूसते मेरे गले लग गये । अनेक बाप के कन्धों की सवारी छोड़ मेरे कन्धों में आ बसे ।

चप्पा-चप्पा धरती का लगभग प्रत्येक कोना मेरी आहट से वाकिफ हो गया । मैं कितना महत्वाकांक्षी होता जा रहा था अपनी प्रसिद्ध का अब मुझे घमंड होने लगा था । क्योंकि अब तक मेरे पास लाखों अलग-अलग समुदाय ,संस्कृति, सभ्यता और लगभग प्रत्येक आयु वर्ग की एक मजबूत सेना हो गई थी ।

यह घमंड मुझे अन्दर से और निखार संवार तो रहा ही था साथ ही एक कैटालिस्ट की भांति आगे बढ़ते रहने का हौसला अफजाई भी करता रहा ।
लोग शहरों से गांवों की तरफ भागने लगे ।
अपना साजों- सामान तितर -बितर कर नंगे पांव लगभग मई -जून की तप्त भट्टी नुमा सड़कों को रात – दिन एक कर पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण जाने लगे ।

सभी यातायात व्यवस्थाओं को बंद कर दिया गया अतः कुछ लोग मेरी चपेट में आये तो वहीं कुछ लोगों को अन्य दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
मेरा कारवां सबसे बड़ा अप्रेल से जून तक बढ़ा और देखते ही देखते उपमहाद्वीप की पवित्र गंगा प्राचीन मगध साम्राज्य से संयुक्त प्रांत तक लाल पीली सरसों की भांति पट गई ।

पूरे विश्व भर में मेरी सेना का सदस्यता अभियान काम जोरों से चल रहा था । कभी कोई मुल्क अपने आंकड़ों में बढ़ोतरी करता तो कभी कोई ,

न्यूज़ कैप्सूल, लगभग बन्द हो गया था अतः सभी सूचनाएं आधुनिक प्रणाली में प्रेषित की जा रही थी आखिर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में जो मेरा जन्म हुआ था ।
वैसे मेरी योजना तो अन्य ग्रहों व उपग्रहों तक भी जाने की है खैर देखते हैं आगे क्या होगा सब भविष्य की गोद में है ।

इधर डिस्को डांसर अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर मेरे पप्पा को कोसने में लगे हुए हैं , उनका मानना है कि मेरा जैसा योग्य विश्व चैंपियन बेटा आखिर कैसे इनके घर में अवतरित हुआ , आखिर कौन सा वो फ्लेवर इसके लिए जिम्मेदार है जिसकी चर्चा अक्सर हर तरफ हो रही है । कोई चमगादड़ तो कोई फुर्तीले चुहे कोई कुछ कोई कुछ कयास लगाए जा रहे हैं खैर छोड़िए ….!
अब बहुत हो गया है लगभग पूरे भू -भाग पर मैं अपने पांव पसार चुका हूं ! अब लोगों की हालत देख मैं भी सहम सा गया मुझे भी लगा कि अब बहुत हो गया और कुछ समय के लिए मैं अपने विषय में सोचने लगा और इससे लोगों को लगने लगा कि अब मैं जा चुका हूं ।

अधिकांश लोगों ने फिर से हिम्मत की और स्वयं को एक मजबूत प्राणी मानते हुए हल्का -हल्का फिर पटरियों पर आने लगे । इससे मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई । मैं आब्जर्वर की तरह देखता रहा परन्तु मैंने अपनी तानाशाही को कुछ हद तक नियंत्रण में रखने की कोशिश की ।
तभी देखा कि लोग अपने घरों से फिर निकलने लगे । चुनाव प्रचार प्रसार तक होने लगा , जहां कल तक दहशत मची हुई थी , एक खौफनाक मंजर हो गया था अचानक लोग सब भूलने लगे । वैसे वो लोग कैसे भूला सकते थे जिन्होंने अपने नौनिहालों, जवां बेटों , बूढ़े मां-बाप को मेरे हवाले किया था । क्या वो मां कभी भूला पायेगी मुझे माफ़ कर पायेगी जिसके बच्चे को में स्तनों से खींच कर ले आया ।

वो मजदूर वर्ग जो कन्धों पर टूटा -फूटा चूल्हा-चौका लिए हजारों मील पैदल चला और तलवों के जिन छालों से सड़कें नैरोलैक पेंट की तरह लाल हो गई और ज्यों ही उन्हें वो घरोंदा दिखाई दिया मैंने उठा लिया ।
उन लोगों को गांवों की तरफ भी भेजा जो शहर के ऐशों आराम भरी जिंदगी में रहकर गांव के गरीबों को घिनौनी नजर से देखते थे । जब कभी भी गांव का आदमी इनकी हवेलियों पर एक दो दिन के लिए रुक जाता तो इनके तेवर देखने लायक होते । अतः आज यह मौका मैं उन ग्रामीणों को देना चाह रहा हूं। और हुआ कुछ यूं ही अनेक ग्रामीणों ने आज इनके लिए भी अपनी हवेली के द्वार बंद कर दिए और अब इन्हें कुछ भुला विसरा याद तो जरुर आया है ।
चलो इसी बहाने सही गांवों में आबादी पहुंची जो दरवाजे लम्बे दशकों से जंग से तंग आ चुके थे अब वहां रौनक लौट आयी ।

आज बच्चों को एक आंगन मिला अपना गांव अपना शहर देखने का मौका मिला । ये नहीं चाहते अब यहां से शहर जाना इनके लिए मैं एक बड़ा त्योहार लेकर आया ऐसा अक्सर आभास होता है । क्योंकि फूल मौज मस्ती में न स्कूल वाली बबली मेडम का डर न ही किसी कापी किताब का टेंसन।

लेकिन मैं इतनी जल्दी कैसे इतना कूरुर हो गया । क्या कुछ कर दिया । लोगों में खौफ देखा जब अपने करीबी ज़िगर के टुकड़े को तक छूने से गुरेज करने लगे । अरे फैंकने लगे थे जहां तहां । खैर आज मनुष्य को एक बात तो जरूर याद आई होगी जिस स्वार्थ शब्द को कभी पन्नों में दफन पाता था आज वह प्रत्येक मुंह में है ।
मनुष्य को जीवन का महत्व समझ आने लगा है ।
उसे अपना- पराया समझ आने लगा है ।
जिन पेड़- पौधों पर अत्याचार ढाहते थक नहीं रहा था अब वो हवा सिलेंडरों में बन्द देख सर पटक रहा है।

वैसे यह जरुरी भी हो गया था । जिस प्रकार से दिन- प्रतिदिन कुछ न कुछ घट रहा था उन सभी की प्रतिपूर्ति हेतु एक नया अवतार जरुरी था अतः मुझे गर्व होना चाहिए जिसे मैंने करके दिखाया ।
क्योंकि सम्राट तो अपने अपने कक्षों के केवाड़ लाक कर बैठ गये , अतः बेसहारा अनाथ जनता का फायदा उठाना मेरे लिए भी तो एक मौका था जिसका भरपूर फायदा मैंने उठाया भी…
इसका मतलब दोषी मैं ही नहीं वो भी हैं जिन्होंने पलटकर भी नहीं देखा खैर ।
यह फिर से मेरे लिए बहुत बड़ा मौका है ये खेला दीदी- खेला भय्या अपने आप करते हैं मैं अपना काम करता हूं।
वैसे मेरे शौक अब महंगे हैं मैं किसी महानता का अब आकांक्षी नहीं क्योंकि इससे पहले इतनी समृद्धि शायद ही किसी ने इतने कम समय में पाई हो ।
देखिए ना स्वयं को विश्व भर में शक्तिशाली कहने वाले डांसर ,जानसन बेबी ,पुदीना भाई , कल कम यंग, छोटा भाई -मोटा भाई , बाबा -मामा समेत स्वयं मेरे मम्मा-पापा के आंख कान ऊंट की गर्दन की तरह खड़े के खड़े हैं । अरे भाई वो सभी अन्दर ही अन्दर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं और निवेदन कर रहे हैं कि उन्हें इस बार माफ़ कर दिया जाय ।
इसलिए ये आपदा को अवसर कहने लगे हैं अतः मुझे भी कुछ ज्ञान लेने की आवश्यकता है । जब यहां तक आ ही गया हुं तो क्यों न कुछ शादी वादी कर ली जाय । मेरे लिए थोड़ी कोई कानून -वानून लगे हैं । आज मैं कुछ हसीनाओं के संग चलता हूं और थोड़ा बीबी बच्चे होंगे तो और भी अच्छा लगेगा । हां थोड़ा सा यह है कि अभी मैं नाबालिक हुं । अरे इसीलिए तो ये लोग सोच रहे हैं कि रैलियों में तो आयेगा नहीं और खूब सारा जोर -शोर से लगे पड़े हैं ।

इन महामूर्खों को कौन समझाए कि अपुन का वोटिंग लिस्ट में नाम हो न हो परन्तु प्रकोप हर जगह अर्थात विचारधारा ही मेरी ओमनीपरजेंट वाली है । खैर इनको क्या फर्क पड़ेगा गलती तो मेरी भी है। इनसे मैंने नपुंसक समझकर दूरियां बनाई है और वहीं बोली भाली जनता के पीछे हाथ धोकर भी और धुलाकर भी पड़ा हुआ हुं ।
अब तो शायद मेरी लुगाइयां अण्डे देने लायक हो गई होगी । काफ़ी समय हो गया है कोई समाचार मिडिया में हरकत में नहीं आया ।

वो रहीस वाले बतायंगे अक्सर ऐसी खबरों पर उनकी भी पैनी नजर होती है । चलो आज कोशिश करता हूं किसी की झोपड़िया के सुराखों से समाचार एजेंसी तक अपनी पहुंच बना सकूं ।
वैसे मैं डरता थोड़ी हूं । अतः मैंने अपनी पसन्द के कुछ रिपोर्टर भी अपने पास अपाइंट कर दिये जो हैंडसम तो थे ही इस पर कोई शक नहीं वहीं, अच्छे वक्ता भी…

हम्म यह सही काम हो गया …
चलिए थोड़ा सा दिल पर पत्थर रखकर कुछ को उनके परिवारों के मध्य से ही चुरा लाया ।
अरे भाई अच्छे लोगों की जरूरत सभी को होती है । अतः मुझे भी है फिर दया धर्म करने से क्या होगा ।
शाम होते होते रिपोर्टरों ने बताया कि मेरी लुगाइयों ने अलग -अलग जगह नवजातों को जन्म दिया है और जिन महाद्वीपों पर इनका जन्म हुआ, वहां के सम्राटों ने स्वयं ही इनके रंग रुप के अनुसार अलग अलग नाम भी रख लिए हैं ।

चलिए मुझे खुशी है जो भी पैदा हुए मैं गिन तो नहीं पाऊंगा क्योंकि जन्नत में पहुंच कर कहां- कहां मौजूद रहा कुछ याद नहीं ।
कहने को तो पुजारी या पादरी भी ब्रह्मचारी होता है लेकिन वो देवदासियां उनके एकाग्र को बनाये रखने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं यह उनसे ज्यादा भला कौन समझ सकता है ।
खैर अब मुझे आगे बढ़ने के लिए अधिकाधिक संख्या में लोगों को जुटाना होगा , क्योंकि अभी एक अच्छा खासा अवसर है ।
मैंने निश्चय किया कि चल भाई फिर से एक पारी और खेली जाय ।
मैं पूरे जोश के साथ एक बार आज फिर पुण्डरभुक्ति की धरती से …
धीरे -धीरे सच कहूं तो अब मैं काफी शक्तिशाली हो गया हूं और बाप बनने के बाद थोड़ा सा समझदारी और जिम्मेदारी भी बढ़ गई है अतः परिस्थितियों को ज्यादा अच्छी तरह समझने लगा हुं । वैसे मैं थोड़ा सा मूर्ख और धूर्त भी कहा जाऊंगा ऐसा इसलिए क्योंकि जहां एक राजा अपने सिंहासन के लिए घर परिवार छोड़कर आ जाते हैं वहां में क्या कर रहा हूं ??
खैर छोड़िए हुं तो नाबालिग न वोट दे सकता न ले सकता !
फिर ऐसा करता हूं अपने नियमों में संशोधन करने की नितांत आवश्यकता है अतः आज शाम को एक घोषणा पत्र द्वारा संसार के प्रत्येक क्षेत्र तक यह संदेश पहुंचाने का प्रयास करता हूं ….

सुनो सुनो सुनो

आज से मैं सी फार कोविड जन्म नाइंटीन और मेरा समस्त परिवार अपने समस्त सैनिकों और जनता के साथ केवल ऐसे स्थानों में मौजूद रहेगा जहां नाच- गाना, शादी- विवाह, और अध्ययन अध्यापन कार्य होगा, जहां गरीब और भोली -भाली जनता होगी अर्थात राजनीतिक दलों की रैलियों से हमारा कोई वास्ता नहीं होगा क्योंकि मेरा आधार कार्ड बना नहीं है वैसे भी मैं नाबालिक हुं वोट न दे सकता न ही ले सकता ।
इस प्रकार मेरा सफ़र आगे बढ़ता गया ।

कुछ समय से मेरा पुत्र ओमिक्रोन विश्व के प्रत्येक क्षेत्र पर अपनी पैनी नजर बनाये हुए है । अतः कोई भी इस भ्रम में न रहें कि आप बच गये।
आपकी समझदारी ही आपका बचाव है ।
सतर्कता बरतने की आवश्यकता है सतर्क रहें ।

धन्यवाद
कोविड नाईनटीन
सम्भावना पन्त
लेखिका

Leave A Reply

Your email address will not be published.