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भीड़ के हाथ

भीड़ में उग आते हैं हाथ
न जाने कितने
अपनी कलुषित मानसिकता
की तृप्ति हेतु
और लड़की न जाने कब तक
खुद को कोसती
पीछा छुड़ाना चाहती है
उन अदृश्य नाखूनों से
जो लगातार
खुरच रहे होते हैं
उसकी आत्मा
वो बदल देना चाहती है
अपने भीड़ में जाने का क्षण
आँखे मूंद
वो कहना चाहती है
अपनी व्यथा
बताना चाहती है
अपनी पीड़ा
पर किससे?
मौन का घूँट
जहर से भी कड़वा
हर स्त्री पीती है
जीवन मे कई कई बार
बस वो कहती नहीं
न तोड़ पाती है
भीड़ में उगे उन
घिनौने हाथों को
जो अचानक उग आते हैं

 

सिम्मी हसन(बलिया)