Home राष्ट्रीय आलोचना लोकतंत्र की खूबसूरती है

आलोचना लोकतंत्र की खूबसूरती है

राजसत्ता पोस्ट

आलोचना लोकतंत्र की खूबसूरती है

आखिर ऐसी कौन सी मज़बूरी आड़े आ रही कि सच बोलने से भी गुरेज़ हो रहा है और सच सुनने से भी,….पिछले दिन पूरा विश्व एक भयावह मंजर का साक्षी रहा, और पिछले साल की त्रासदी ने समुची दुनिया को ऐसे झकझोर दिया है कि शायद ही आगामी दस-बीस वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हुआ जा सके बशर्ते आँखों पर रंगीन चश्मा ना हो क्योंकि इस वर्ष डेढ़ गुना अधिक हुए gst के वसूली को ही वास्तविक समृद्धि ना मान लिया जाये,… इस वर्ष भी पुनरावृत्ति के आसार नज़र आ रहे, पर सोचिये जरा दूध से जला हुआ इस बार फूँक कर छाछ(मट्ठा) पीना तो दूर,भट्ठी ही मुंह में लेने पर अमादा है,

इतिहास पढ़ना इसलिए भी जरुरी हो जाता है ताकि वर्तमान को सतर्क किया जा सके, पर जिसकी आशंका पुनः अपने चरमोतकर्ष की तरफ अग्रसर है वह अभी महज दो तीन महीने पहले तक की बात है या यूँ कहें कि अभी हम उसी समय के श्रृंखला में चल रहें हैं…. अभी कल की ही बातें हैं और सबक के नाम पर जीरो टालरेन्स?

लोग भयवश आतंकित थे, आज़ादी के बाद के भारत में यह पहला ऐसा समाज था जिसने इंसान के मरने पर हाय तौबा करि, और किसी के मरने पर शरीक होने के बजाय दूरी बनाये…. इंसान इंसान से कुछ मामलों में नजदीक आया तो नैतिक मूल्यों के आधार पर खाईं अप्रत्याशित गहरी हुई, स्कुल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर, तंत्र और आदमी सब बेहद परेशान और लाचार था, बहुत लोग कोरोना परिवेश के कारण अन्य रोग का उपचार ना करा सके और खुद के जान की बलि कोरोना के बलिवेदी पर चढ़ाना पड़ा

इस तरह का दौर अभी चार महीने पहिले तक था, सरकार शिक्षण संस्थान यूँ कहें राष्ट्र निर्माण के सबसे अहम् अवयव को प्राथमिकता के क्रम में सबसे निचले पायदान पर रखी, और शराब का ठेका सबसे पहले पायदान पर…. यह लम्बे डिबेट का विषय है, अब सवाल आज का है, महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली, उत्तरप्रदेश से लेकर राजस्थान तक कोरोना बेतहासा बढ़ रहा है पर अफ़सोस इसका रौद्र रूप का प्रकोप विधानसभा चुनाव पर नहीं पड़ रहा… कल तक कोरोना काल में मिडिया, तंत्र और संसाधन के सहारे जिस तरह से भय और आतंक का माहौल बनाया जा रहा था वह अब एकदम चर्चा का विषय नहीं है, ना ही श्री ममता बनर्जी, ना ही श्री अमित शाह और ना ही मिडिया ने एक बार भी इस चीज को जरुरी मिनाफेस्टो में रखा…. अफ़सोस, समाज और राष्ट्र निर्माण की बात करने वाले इस विषय पर मौन हैं कि पहले समाज और अंतिम इकाई इंसान बचाना जरुरी है या फिर चुनाव?

लोकतंत्र के नाम पर राष्ट्रवाद के सहारे घर कर गयी तानाशाही की जवाबदेही कौन तय करेगा? आम आदमी, सरकार या मिडिया? ममता जी और नरेन्द्रमोदी दोनों जन के चुनावी सभा को देखकर निष्कर्ष यही निकल रहा है कि इन्हे यथार्थ में देश प्रेम नहीं बल्कि चुनाव केंद्रित देश से प्रेम है, पर अफ़सोस इसे आम जनमानस ना देख रखा है ना समझ रहा है ना ही महसूस करना चाहता है, असमंजस इस बात की है कि वह इन सब चीजों को समझ नहीं पा रहा या फिर उसे ये सब अच्छा लग रहा है और अगर अच्छा लग रहा है तो ऐसी कौन सी जड़ी बूटी सूंघ लिए हैं जो इतना मदहोश हो गए हैं कि चुनावी बयानबाजी में गिरते स्तर को देख नहीं पा रहे… खुलेआम अशोभनीय व्यंग… क्या दोनों तरफ से हो रहे इस तरह के भाषण संस्कार से समाज में सद्भाव संभव है? युवा जानना क्यों नहीं चाह रहा है कि एक लोकतांत्रिक देश में विभिन्न मत रखने वाले से किस प्रकार की लड़ाई लड़ी जाती है? आज का युवा यह भी सवाल कर रहा है कि आखिर विकल्प क्या है? पर इन युवाओं को समझना होगा कि चुनी हुई सरकार की हारे हुए और अब विपक्ष में बैठे विपक्षी दल से तुलना नहीं करना है और ना ही पिछले को जिम्मेदार ठहराना है, लोकतंत्र की खूबसूरती वोट डालने, किसी को भी समर्थन देने के साथ साथ आलोचना का भी अधिकार देती है, लोकतंत्र में आलोचना और टिप्पणी के संस्कार को ज़ब तक मिस गाइड किया जाएगा आम आदमी कमजोर होगा एक वोटर कमजोर होगा, सत्ताधीश पार्टी के समर्थक होकर पर सरकार की आलोचना बेहद जरुरी है यह लोकतांत्रिक विशेषता भी है और इसी विशेषता में शासन के स्वेछाचारी और अहंकारी होने से रोकने हेतु कुंजी भी है, शायद इस बात का भान कुछ देर से समझ आ आये…..

राजनीति में विपक्ष के साथ साथ दबाव समूह की भी भूमिका बहुत ही प्रभावी होती है, योजना, निति के सही गलत मायने पर सरकार का ध्यान आकर्षित कराने में इनकी महती भूमिका होती है, पर अफ़सोस ये भी अपने जिम्मेदारियों से समझौता कर सत्ता के साथ सन्धि कर लिए अब बची अंतिम सत्ता जिसे संविधान में भी सबसे ज्यादा ताकतवार बताया गया है वह है जनता/आवाम….

अब जरा विडंबना देखिये गाँव के बुरबक को प्रधान जी कहने जैसी कहावत लागू हो रही है आज की जनता और उसमें निहित अंतिम सत्ता, ये अंतिम सत्ता कमजोर क्यूँ हुई, इसमें बहुत हद तक आज़ादी के बाद सत्तधीशों का भी हाँथ रहा, गांधी और सहजानंद सरस्वती के सपनों को धरातल पर ना उतारना, और बहुत हद तक आम जनमानस भी जिम्मेदार रहा आवाम पूरी तरह से सरकार पर निर्भर रहने की आदी होती गयी परिणाम ये हुआ कि हम राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में भी पीछे होते गए इसीलिए आज कोई भी राष्ट्र और देश के नाम पर हमें गुमराह कर ले जा रहा है क्योंकि हमने अपने हिस्से के देश निर्माण वाले होमवर्क पर काम किया ही नहीं….

इसीलिए देश हित में उठाये गए प्रतिकात्मक और आभासी कदम और भाषण को भी हम हकीकत मान बैठते हैं और उसकी भावनाओं में बहने लगते हैं और ज़ब प्रेम की तरह भावना गिरफ्त में आ गयी तो दीवाने आशिक की तरह उससे कुछ भी कराया जा सकता है, रूह कैद है किसी और के पास और आवाम चेतना से खाली, तार्किकता से परे ज़िंदा लाश बनकर रह जाता है जिसका फायदा सरकार और सत्ता उठाती रहती है, इसीलिए जिस तरह से राजनीति बिना भावनाओं में बहे समाज का उपयोग करता है उसी तरह युवाओं को बिना भावना में बहे तार्किकता के आधार पर वोट देने से लेकर सरकार बनाने तक में उत्सुक होना चाहिए और हाँ प्रजातंत्र में वोट दे देने भर से ही लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती बल्कि सरकार के समर्थक हों या आलोचक समय समय पर मूल्यांकन करते रहना होगा और जो वाकई समाज हित में ना हो उसके खिलाफ जन समूह के माध्यम से असंतोष का प्रकटीकरण सरकार के समक्ष प्रस्तुत करते रहना होगा ताकि सरकार स्वेच्छाचारी, निरंकुश और अहंकारी ना हो जाये….

सुरेश राय चुन्नी
इलाहाबाद विश्वविद्यालय