विदेशों तक निर्यात किया जाने वाला सेबिया पर मंडरा रहा संकट, फसल हुई बर्बाद ।

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प्रयागराज,अमरूद एक एैसा फल हैं जो अधिकतर लोगों की पहली पसंद होता है और सेबिया अमरूद की तो बात ही अलग है परंतु इस बार संगमनगरी की पहचान सेबिया (सुर्खा) अमरूद के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। इस बार सेबिया अमरूद की करीब 80 प्रतिशत तक फसल कीड़े और खैरा रोग लगने के कारण बर्बाद हो गई।

इससे बाजार में आवक लगभग तीन चौथाई तक घट गई। आलम यह है कि सुर्खा बाजार में खोजने पर मिलता है। दाम भी 100 रुपये किलो है।
सेबिया अमरूद का उत्पादन शहर पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र व कौशांबी जिले के कई गांवों में बड़े पैमाने पर होता था। इस साल बारिश ज्यादा देर तक होने के कारण अमरूद की फसल में जोरई नामक कीड़े और खैरा रोग लग गए। इसकी वजह से लगभग 75 से 80 प्रतिशत तक फसल चौपट हो गई। करीब 20 प्रतिशत फसल जो बची है, उसकी गुणवत्ता बहुत खराब है। मंडी और बाजार में सुर्खा की आवक एकदम से घट जाने के कारण छत्तीसगढ़ के सफेदा अमरूद को घुसपैठ बनाने का अवसर मिल गया। उत्पादक मुन्नू पटेल बताते हैं कि बाकराबाद, बमरौली, असरौली, चायल, मनौरी, असरावल खुर्द, मकनपुर आदि गांवों में सुर्खा अमरूद का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। लेकिन, दो वर्षों से कीड़े और रोग लग जाने से फसल बर्बाद हो रही है। इससे बचाव के लिए कृषि विभाग द्वारा न उत्पादकों को प्रशिक्षण दिया गया न ही दवा का छिड़काव किया गया। ऐसे में जिन सैकड़ों किसानों की आजीविका इस पर निर्भर है, उनमें घोर निराशा है। उत्पाद की गुणवत्ता खराब होने के कारण उत्पादकों को 10-15 रुपये किलो अमरूद बेचना पड़ रहा। लिहाजा, लोग अब खेती में बदलाव के लिए सोचने लगे हैं
मुन्नू बताते हैं कि दो साल पहले तक सेबिया ,अमरूद ,गोरखपुर, बिहार, दिल्ली, मुंबई समेत देश भर में व्यापारी ले जाते थे। गोरखपुर से नेपाल और मुंबई से सऊदी अरब निर्यात भी होता था। लेकिन, अब शहर में ही पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
मुंडेरा फल एवं सब्जी व्यापार मंडल के महामंत्री बच्चा यादव का कहना है कि मंडी में सेबिया की आवक करीब 25 प्रतिशत है। रेट 30 रुपये किलो है। छत्तीसगढ़ से आने वाले अमरूद का दाम 35 रुपये किलो है। वहीं, फल कारोबारी गोलू का कहना है कि सेबिया बाजार में ज्यादा है नहीं। सफेदा खाने में स्वादिष्ट न होने से मांग बहुत कम है।

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