कंक्रीट का जंगल
K

बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से बना
कंक्रीट का ये जंगल
निगलता जा रहा है खेत
हरियाली और पेड़ों को
कसता जा रहा पंजा प्रदूषण 
मानव के गले पर रोज़
नीला आसमाँ काला पड़ा
खोता जा रहा नीलम सी आभा
ये धरती रोज़ बंजर और नदी
काली सी होती जा रही है
जो नदियाँ जीवन दायिनी थीं
डायन सी होती जा रहीं हैं
निगलती रोज़ फसलें और जानें..
फैक्ट्रियों के कचरे से मिली
ये रोज़ आफत सी ही बनती जा रही हैं
घोंटते हम जा रहें दम
आने वाली नस्लों की हम
पटाख़े फोड़ ज़हरीली हवाएँ
हर रोज़ फैलाते जा रहे हैं
आँखों को करके बन्द खुद में जिए या
जीवन का गला ही घोंटते हम जा रहे हैं


सिम्मी हसन, बेल्थरा रोड़ बलिया, यूपी

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