करुणा है धर्म का वास्तविक मर्म

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 सच्चे धर्मगुरु वे ही हैं, जो विश्व को परमात्मा की अभिव्यक्ति मानते हैं और सकल सृष्टि से प्रेम करते हैं तथा उसकी पूजा करते हैं। वे अनेकता में एकता का दर्शन करते हैं। किन्तु आज कई अनुभवहीन लोग शास्त्र-वाक्यों का अर्थ तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहे हैं। धर्म और अध्यात्म हमारे दिलों को खोलने वाली चाबियों जैसे हैं, ताकि हम जगत को करुणा सहित देख पाएं। किन्तु स्वार्थ में अंधा आदमी आज अपनी विवेक-शक्ति खो बैठा है। दिल को खोलने वाली चाबी से उसने इसे बंद करने का काम लिया है, बल्कि उसने इस चाबी का प्रयोग अपने हृदय में स्वार्थ तथा क्रूरता का अंधेरा और गहराने के लिए किया है। इस संदर्भ में एक कथा को सुनना सार्थक रहेगा-

एक बार किसी सम्मेलन में भाग लेने गए चार लोगों को एक टापू पर इकट्ठे रात बितानी पड़ी। कड़ाकेदार ठंड से वे ठिठुर रहे थे। उन चारों के पास माचिस और लकड़ियां थीं। लेकिन हर कोई सोच रहा था कि उसी के पास है। एक ने सोचा- ‘उस आदमी के गले में पड़ा लॉकेट बताता है कि वो दूसरे धर्म को मानने वाला है। मैं उसके लिए आग क्यों जलाऊं!’

दूसरे ने सोचा- ‘ये दूसरे देश का आदमी है। ये हमेशा हमसे लड़ाई करते रहते हैं। इसे गर्मी देने के लिए मैं अपनी माचिस और लकड़ियों का उपयोग कभी नहीं करूंगा!’ तीसरा आदमी अपने पास बैठे आदमी को देख कर सोचने लगा- ‘इसे मैं जानता हूं। यह हमारे धर्म के विरुद्ध प्रचार करता है। इसे तो मैं कभी अपनी अपनी लकड़ियों का लाभ नहीं उठाने दूंगा।’ चौथा सोच रहा था- ‘इस आदमी का रंग तो देखो जरा। मुझे फूटी आंख नहीं सुहाते ऐसे लोग! ’ इस तरह बिना आग सुलगाये ही, सब ठंड में ठिठुर-ठिठुर कर बीमार हो गए। यहां विपत्ति और कठिन स्थितियों का कारण सर्दी नहीं, हृदय की निष्ठुरता थी।

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