“सिगरेट”

खबरे सुने

रोज़ देखती हूँ
सामने खिड़की से
छत पर आता है एक बूढ़ा
बार बार
कितनी बार
घूमने???
नहीं नहीं
देखने
जवान लड़का उसका
चला आता है छत पर
चुपचाप
कभी उदासीयाँ छिपाने,
कभी रोने
ज़्यादातर सुलगाने अपनी सिगरेट
खोया है उसने किसी को
शायद कोई अपना रहा होगा
या हो कोई आत्मग्लानि
जिसमे घुलता हुआ
वो सुलगा लेता है
कितनी सिगरेटें
बाप देखता है
चला जाता है
सही तो है बेटा
फिर आता है
और बेटा….
फिर से सुलगाता है सिगरेटें
जो चला गया उसके लिए
जला डालता है
बाप की फिक्र
धुएँ में उड़ाता है माँ की कसमें
बार बार
अपनी जिद में
सुलगाता रहता है
कितने अपनो की फिक्रें
मुहब्बतें, कसमें
और एक दिन
जब न बाप होगा न माँ
तब भी वही छत होगी
वही दिन , वही रातें होंगी
पर वो बूढ़ा नहीं होगा
बार बार जाकर छत पर
देखने को तुम्हें
न वो माँ होगी
जो इशारे से कहेगी
की जो छत पर गया है
शायद किसी फिक्र में हो
तब जो सिगरेट सुलग रही है
तुम्हे कहीं भी सुकून न देगी

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