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कविता-शायरी

आफत ये टाल दी मौला

मौला कोई उम्मीद नहीं रूह तड़पी जाती है हमें निज़ात दे आफ़त ये टाल दे मौला उजाले रात से बद्तर हुए क्यों जाते हैं सियाह रात है जुगनू ही टाँक दे मौला बच्चे भूखे है यहाँ दर्द से बिलखते हैं चाँद को तोड़ के बस्ती में बाँट दे मौला उठी है लाश…

विजय तुम्हारी होगी ……..

जग निर्णायक बनकर जब-जब, दोष मढ़ेगा तुम पर, शस्त्र मौन का धारण करना, विजय तुम्हारी होगी ।। साम दाम और दंड भेद, चाहे षड़यन्त्र रचे हो, तुम चलना राघव के पथ पर, विजय तुम्हारी होगी ।। मन से हारे लोगों ने ही, जीती बाज़ी हारी…

बेहतर यही होगा

सुनो बेहतर यही होगा यू मेरा नाम सफ़हो पर किताबों में दरख्तों पर तुम लिखना छोड़ दो जानम जहाँ से भी गुज़रती हूँ मैं खुद का नाम पढ़ती हूँ ये दुनियाँ कुछ नहीं कहती मगर सबकुछ समझती है तुम्हारी आँख के रौशन सबब का हाल पढ़ती है ज़रा आंखों को…

इस तरह वो हमें आजमाते रहे, बात कोई भी हो दिल जलाते रहे

आज फिर से पढ़ रही हूं मैं पुरानी चिट्ठियाँ. कर रही महसूस अपने दर्मियाँ ये दूरियाँ.. कैद थी इक वक़्त से लोगों से जो सहमी डरी. आज लो आज़ाद कर दी मन की सारी तितलियाँ. था अकेला फूल वो जो खिल रहा था ड़ाल पे जब हवाँ चलती थी उसको चूमती थी…

उम्र में 40+को पार कर चुकीं महिलाएं बस एक अच्छा दोस्त चाहती हैं।।

वो बांटना चाहती है अपने रत-जगे जो अक्सर किसी अस्पताल की बेंच पर या किसी दूर जाने वाली गाड़ी के इंतजार में काटे होते हैं! वो बांटना चाहती है अपने आंसू जो अक्सर रति-क्रीड़ा के बाद,पति के मुंह फेरकर सोने के बाद बहाए होते हैं! वो बांटना…

तो एक गाँधी था मुल्क में जो उठा के लाठी चला था लड़ने बमों से

अपना वतन ----------------- तो एक गाँधी था मुल्क में जो उठा के लाठी चला था लड़ने बमों से फाँसी मशीनगन से ब्रीतानी-चालाकियों के फ़न से वो एक लाठी जिसे सहारा बनाया लेकिन फ़क़त क़दम दर क़दम मिलाने उसे क़सम थी- "उठे न भिड़ने गिरे न सर…

उम्र में 40+को पार कर चुकीं महिलाएं बस एक अच्छा दोस्त चाहती हैं।।

वो बांटना चाहती है अपने रत-जगे जो अक्सर किसी अस्पताल की बेंच पर या किसी दूर जाने वाली गाड़ी के इंतजार में काटे होते हैं! वो बांटना चाहती है अपने आंसू जो अक्सर रति-क्रीड़ा के बाद,पति के मुंह फेरकर सोने के बाद बहाए होते हैं!…

स्वर्ग सी धरती

हम जो होते हैं हम वही होते हैं क्यों बेवजह आडंबर का आवरण ओढ़कर दुनिया को भ्रमित करते हैं... दुनिया छली नहीं छली दुनिया को बनाता है मानव जिंदगी जीने के लिए ना जाने कैसे-कैसे ढोंग रचता है मानव... जानवरों में सबसे शीर्ष कहलाता है…