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वरदान

तुम्हारा वरदान
मेरा अभिशाप था
मैं हृदय से निकली
भाषाओं से मिली
शब्दों में हंसी,
शब्दों में रोई
और फिर रह जाऊँगी
अपने शब्दों में ही
जो चाहेंगे मुझे ढूंढ़ना
मैं यहीं मिलूंगी
इन्हीं शब्दों में
बस दिल…
उसे बचाना
कहीं मेरा अभिशाप
तुममे न बस जाए

✍️सिम्मी हसन