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“नंगे पाँव”

गर्मियाँ जा चुकीं थी
अक्टूबर के आखिरी दिन जा रहे थे
मेरे पांव खाली थे
पर ज़हन में कभी आई नहीं ये बात
की पांव खाली हैं
नवंबर की बयार
ठंढी हवाएं मदमस्त करतीं
सर्दी चुभने लगी थी
जैसे तैसे कर लिया
कुछ गर्म कपड़ों का इंतज़ाम
पर पांव खाली थे
कट गया नवम्बर भी
सर्दी बढ़ गयी थी
दिसम्बर का एक एक दिन
बढ़ाता जाता
अपनी सर्दी की तीव्रता
सूरज कम उगने लगा
ठंढ हद से ज़्यादा
और पाँव
अब भी खाली थे
पर अब खाली पाँव
चुभने लगे थे
ठंढ में अकड़े
बर्फ की तरह
सुन्न पड़ जाने वाले
अब ज़हन में
खाने से ज़्यादा
जूता हावी था
जेब थी ही नहीं
भरती कैसे
उम्मीदें टटोलीं
सब ख़ाली
ज़मीन चुभने लगी थी
ठंडे पैर सोने नहीं देते थे
लालटेनों से सेक कर
कुछ मिलता आराम
जनवरी की शुरुआत थी
ठंढी हवा
चुभोने लगीं थीं सुइयां
पाले की मार
पड़ रही थी सब पर
घना कोहरा
कि एक सुबह देखा
मेरा शरीर पड़ा था
पुआल के उस बिस्तर पर
जहां मैं सोया करती थीं
शरीर पर कुछ गर्म कपड़े
पाँव अब भी खाली ही थे
पर अब दूर रह गया था कहीं
महसूस होना