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चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का विशलेषण- अशोक बालियान

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चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का विशलेषण- अशोक बालियान
दुनिया में डार्विन के आलोचकों का कहना है कि उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज प्रकृतिवादी चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत गलत है।डार्विन के सिद्धांत के विपरीत इस विचार के अनुसार जब से इस धरती पर इंसान आया है, तब से वह मानव रूप में ही है।इस लिए स्कूल और कॉलेज पाठ्यक्रम में इसे बदलने की जरूरत है।
वर्ष 1859 में चार्ल्स डार्विन ने ‘ओरिजिन आफ स्पेसीज‘ नामक पुस्तक प्रकाशित करके विकासवाद का सिद्धांत प्रकाशित किया था। 19 वीं सदी के डारविन के आलोचकों ने कहा कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत गलत है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने वैसी ही भिन्न जातियां बनाई हैं जैसी हैं और कोई भी विकास प्रक्रिया नहीं हुई है।
मनुष्य की जिज्ञासाएँ कभी शांत नहीं होती हैं। सत्य की खोज हमेशा जारी रहती है। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि जीवाश्‍मों की जाँच से पता चलता है कि एक लंबा अरसा बीतने पर भी अलग-अलग प्रकार के जंतुओं में कोई बदलाव नहीं आया। किसी भी जीवाश्‍म से यह साबित नहीं होता कि एक प्रकार के जानवर से दूसरे प्रकार के जानवर का विकास हुआ है।
अमेरिका के 40 प्रतिशत वयस्क विकासवाद के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, और शेष 60 प्रतिशत उसे अस्वीकार करते हैं और सृष्टिवाद के सिद्धांत को मानते हैं। अमेरिका के लुईसियाना राज्य में वर्ष 2008 से साएंस एजूकेशन एक्ट पास करके स्कूल पाठ्यक्रम में सृष्टिवाद को पढ़ाया जा रहा है।
तुर्की में स्थानीय और राष्ट्रीय मूल्यों को अधिक अहम बनाने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम से डार्विन से विकासवाद के सिद्धांत को हटाया जा रहा है।
भारत में भी इस पर विचार होना चाहिए कि क्यों न ड़ार्विन के सिद्धांत के साथ पाठ्य पुस्तकों में यह थ्योरी भी शामिल की जाए कि मनुष्य अपने मौजूदा रूप में ही पृथ्वी पर आया है और हमेशा वैसा ही रहेगा।
पौराणिक कहानियों में राम भक्त हनुमान् को बन्दर बताने वालों को वाल्मीकीय रामायण का गम्भीर ज्ञान नहीं है।
वस्तुतः वानर, ऋक्ष, गृध, किन्नर, असुर, देव, नाग आदि मनुष्य जाति के ही नाना वर्ग थे।ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रक्षेपों (मिलावट) को पहचानना परिश्रम साध्य व बुद्धिगम्य कार्य है।
धरती पर जीवन का होना, अनगिणत जीवों की प्रजातियां, उनका उद्भव, उनके निर्माण की प्रक्रिया, ये सब एक रहस्य है। विज्ञान का काम इस रहस्य से पर्दा उठाना है और अज्ञात को ज्ञात बनाना है। विज्ञान को विकासवाद के सिद्धांत व् सृष्टिवाद के सिद्धांत अर्थात दोनों पर अपनी खोज को जारी रखना होगा।और तार्किक दृष्टी का सहारा लेकर ही सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग करना होगा।

लेखक अशोक बालियान