बिंदास हूँ और रहूँगी

खबरे सुने

अपने किरदार से अलग अदाकारी करु
ये बात भाती नही मुझको
जो हूँ जैसी हूँ
सबके सामने हूँ
ना पीठ पीछे ज्यादा
ना मुँह पर कम हूँ
ना सोलह साल की कमसीन हूँ
ना बनना चाहती हूँ
हाँ मैं 40 के पार हूँ
और वही रहना चाहती हूँ
मुझे बिल्कुल शौक नही
पडोस के बच्चे से दीदी, भाभी कहलवाने का
मैं उनकी आंटी जैसी हूँ
वही कहलवाना भी चाहती हूँ
हाँ मैं……………………….
और वही…………………..
कभी जीन्स पहन उड़ती हूँ उन्मुक्त गगन में
तो कभी साड़ी बांध धरा पर चलती आहिस्ता-आहिस्ता
छोटी-बड़ी सभी बिन्दी लगाने लगी हूँ
सुना है सब फबता है मुझपर
ना भी फबे………
अब इतना नही सोचना चाहती हूँ
हाँ मैं……………………..
और वही…………………
कभी चुड़ियाँ खनकाती हूँ हाथों में
कभी घड़ी बांध चलती हूँ समय के संग में
आजादी अच्छी लगती है मुझको
पर,अब रिश्तो के बंधन भी भाने लगे है मुझको
मैं दोनों में तालमेल बिठाना सीख गई हूँ
ना उम्र से ज्यादा ना उम्र से कम लगना चाहती हूँ
हाँ मैं…………………. और वही………………………….
अपनी बेटे की बड़ी बहन जैसी लगती हूँ
ये सुनना पसंद नही मुझको
माँ हूँ, माँ की गरिमा का भी ख्याल रखती हूँ
थोड़ा पास बिठा उपदेश देती हूँ
तो थोड़ा दोस्त बन बिंदास भी लगना चाहती हूँ
हाँ…… मैं…………………
और….. वही……………..
कम उम्र की नासमझी से परे
बुढ़पा के तजुर्बे से पहले
परिपक्वता का समागम
चेहरे पर अच्छा लगने लगा है मुझको
हल्की सी झांकती बालों की चाँदी को छुपाना नही चाहती हूँ
हाँ …..मैं…………………
और वही……………. ना जीवन को हराना है मुझको
ना मौत से जीतना है मुझ

ये तो तय है कि आये है तो एकदिन जाना है सबको
इसिलिए कोई गम नही पालना चाहती हूँ
बस आज और इस पल को जीना चाहती हूँ
हाँ मैं…………………….
और वही…………….

✒️ दीप्ति भटनागर

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