अक्षय की अच्छी नहीं रही डिजिटल बोहनी
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सिनेमा में अपना करियर अक्षय खन्ना ने अपनी गलतियों से डुबोया। अब वही काम वह डिजिटल दुनिया में करने जा रहे हैं। एक ऐसी घटना जिसके बारे में सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि पूरा देश और पूरी दुनिया जानती है, उसकी ‘फिल्मी’ कहानी में उनका होना ही सबसे बड़ा सवाल है। जी हां, ये कहानी पूरी फिल्मी है। कहने को भले इसे सत्य घटनाओं से प्रेरित बताया जाए लेकिन केन घोष निर्देशित ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ की शुरुआत जितनी दमदार होती है, मामला कश्मीर से निकलकर गुजरात जाते ही फुस्स हो जाता है। अक्षय खन्ना को कहां तो ‘फैमिली मैन’ से ओटीटी पर डेब्यू का मौका मिल रहा था और कहां उन्होंने अपनी नैया एक ऐसी जगह आकर डुबोई है जहां माझी को ही नहीं पता कि किनारा किधर है?
‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ कहने को जी5 की ‘स्टेट ऑफ सीज’ फ्रेंचाइजी की अगली कड़ी है लेकिन दोनों में कोई कड़ी जुड़ती नहीं है। एनएसजी कमांडोज की कहानी ही अगर ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ में दिखानी थी तो इसमें राजनीति नहीं लानी थी। और, अगर राजनीति लानी भी थी तो फिर मामला इतना श्वेत श्याम नहीं रखना था। अब देश की राजनीति में सब कुछ साफ साफ है। ‘हम लोग’ और ‘ये लोग’ में बंट चुकी आबादी के लिए ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ जैसी कोशिशें गले नहीं उतरतीं। केन घोष यहां भ्रमित फिल्म निर्देशक दिखते हैं। वह जानते ही नहीं कि वह क्या कर रहें हैं और क्यों कर रहे हैं?
देश में 19 साल पहले भूचाल लाने वाली अक्षरधाम मंदिर पर हमले की घटना को कृष्णधाम बना देना ही पहली चूक है। समझिए अगर केन घोष को संसद पर हमले पर फिल्म बनाने को कहा जाए तो क्या वह इसका नाम भी बदल देंगे। अधिकतर भारतीय फिल्मकारों को सच को सच कहने की रीढ़ मिलनी अभी बाकी है। हो सकता है कि सच्ची घटनाओं को सही सही तरीके से बनाने में दिक्कतें बहुत हों, लेकिन आसान जो है वह अलहदा हुआ ही कब है। फिल्म ‘शक्ति’ में दिलीप कुमार ने एक डॉयलॉग मारा था, ‘जो लोग सच्चाई की तरफदारी की कसम खाते हैं, जिंदगी उनके बड़े कठिन इम्तिहान लेती है।’ ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ की शुरूआत में ही बता दिया जाता है कि ये फिल्म सच्ची नहीं है। उम्मीद उसके बाद भी इसलिए बंधी रहती है क्योंकि अपने इंचार्ज का आदेश न मानकर एनएसजी टुकड़ी की अगुआई कर रहा वतनपरस्त जब जान जोखिम में डालता है तो दुआ निकलती है। शुरू की 10 मिनट तक फिल्म एकदम बांध कर रखती है। और, इसके बाद ये कतरा कतरा कम होना शुरू हो जाती है।
दो फिरंगी लेखकों से अभिमन्यु सिंह ने ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ लिखवाई है। पहले ही हमले में घुटनों पर आया उनका किरदार बाद में कितनी भी अंगड़ाइयां लेता है, पर अपने घुटनों पर खड़ा नहीं हो पाता। हमले के वक्त की घटनाओं में एनएसजी का रणनीति बनाना और दूसरी तरफ आतंकवादियों का अपनी योजना को अंजाम देने के लिए तरकीबें निकालना एकबारगी फिल्म के सही दिशा में जाने का बहाना देता है। लेकिन, इसके किरदार इसका तिलिस्म बंधने नहीं देते। हर किरदार टिपिकल मसाला फिल्मों से निकाला गया किरदार दिखता है। नियमित तौर पर हिंदी फिल्में देखने वाले तो इसके सारे अगले सीन पहले वाले सीन में बता सकते हैं।
पटकथा और निर्देशन में मात खाने के बाद ‘स्टेट ऑफ सीज- टेंपल अटैक’ अदाकारी में भी मात खाती है। अक्षय खन्ना पूरी कोशिश करते हैं कि वह अपने भीतरी और बाहरी एहसासों को कायदे से कैमरे के सामने जता पाएं लेकिन उनके अभिनय की अपनी सीमाएं हैं। उनका चेहरा तयशुदा कोणों पर सिमटता और बिखरता है और ये अब से नहीं उनकी पहली फिल्म ‘हिमालयपुत्र’ से चला आ रहा है। यूं लगता है कि बतौर अभिनेता वह खुद को चुनौती देना ही नहीं चाहते।  बाकी कलाकार भी बस जैसे एक और प्रोजेक्ट निपटाते से दिखते हैं। रही सही कसर अच्छे मुसलमान, बुरे मुसलमान की डोरी पर संतुलन साधने की कोशिश पूरी कर देती है। फिल्म तकनीकी तौर पर भी कुछ रंग नहीं जमा पाई। कोरोना संक्रमण काल में भले सब घर पर ही हों लेकिन वक्त तो फिर भी कीमती है। जी5 की इस फिल्म को समय देना बेकार ही है।

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