किसान नेताओं में सीएम चेहरा तलाश रही 'आप'  
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चंडीगढ़: Aam Aadmi Party की ओर से इस मामले में किसान नेता बलबीर राजेवाल से कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या संयुक्त किसान मोर्चे में शामिल अन्य किसान नेताओं के बीच सहमति बनाने की आ रही है। अब तक अधिकतर किसान नेता राजनीति में आने और चुनाव लड़ने से इनकार करते रहे हैं। इस तरह आम आदमी पार्टी को एक तरफ तो किसान नेताओं को राजनीति में लाने के प्रयास करने पड़ रहे हैं, वहीं किसान नेताओं के बीच राजेवाल के नाम पर सहमति बनाने के लिए भी जोर-आजमाइश करनी पड़ रही है।

पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के बीते सप्ताह चंडीगढ़ दौरे के समय किए गए सिख मुख्यमंत्री संबंधी एलान के बाद सूबे के सियासी हलकों में कयास शुरू हो गए थे। राजनीतिक विशेषज्ञ अपने स्तर पर सिख मुख्यमंत्री के रूप में चेहरा तलाशने लगे थे और उनके सामने सबसे पहला नाम, कैप्टन अमरिंदर सिंह के धुर विरोधी कांग्रेसी विधायक नवजोत सिंह सिद्धू का आ रहा था। उन्हें 2017 के चुनाव से पहले भी आम आदमी पार्टी की ओर से ऑफर मिली थी, लेकिन सिद्धू आप में शामिल नहीं हुए थे।

अब दिल्ली में पार्टी सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, अरविंद केजरीवाल और किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल के बीच करीब आठ दौर की बातचीत हो चुकी है। यह भी पता चला है कि बलबीर राजेवाल का रुख भी चुनाव लड़ने को लेकर नरम हुआ है, लेकिन वे अपने साथी किसान नेताओं की सहमति के बिना कोई फैसला लेने को तैयार नहीं हैं।

दूसरी ओर, भाकियू एकता उगराहां के प्रमुख सुखदेव सिंह से जब इस बारे में प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने केजरीवाल और राजेवाल के बीच वार्ता पर कुछ भी साफ न कहते हुए केवल यही कहा कि किसान नेता राजनीति में शामिल होने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राजेवाल भी काफी पहले साफ कर चुके हैं कि वह राजनीति में नहीं आएंगे।

वहीं, किसान नेता रुलदा सिंह का कहना है कि राजनीति किसानों के बस की नहीं है। किसानों ने तो कभी सरपंच पद का चुनाव नहीं लड़ा, वह विधानसभा चुनाव कहां लड़ सकेंगे? वहीं, किसान नेता दर्शन पाल भी पहले से किसानों के राजनीति में जाने का विरोध करते रहे हैं। 

वहीं हरियाणा के प्रमुख किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के विचार कुछ अलग हैं। गुरुवार को उन्होंने कहा कि पंजाब की राजनीति में किसानों को कदम रखना चाहिए और अब यह जरूरी भी हो चुका है। दूसरी ओर, राजेवाल ने इस संबंध में जब पूछा गया तो वे इस सवाल को टाल गए। 

आप प्रमुख केजरीवाल अगर आंदोलनकारी किसानों को साथ लेकर बलबीर राजेवाल को मुख्यमंत्री के रूप में सामने लाने में सफल हो गए तो पंजाब का सियासी चेहरा पूरी तरह बदलना तय माना जा रहा है। सूबे की राजनीति की धूरी अब तक बादल परिवार (अकाली दल) और कैप्टन अमरिंदर सिंह (कांग्रेस) के बीच ही घूमती रही है। अन्य कोई भी सियासी दल अपने बलबूते प्रदेश की राजनीति में सर्वेसर्वा नहीं बन सका है। वहीं, राज्य में मौजूदा किसान आंदोलन केवल आंदोलन ही नहीं बल्कि एक लहर का रूप ले चुका है। अगर कोई पार्टी आंदोलनकारी किसान नेताओं को सीधे तौर पर चुनाव में उतारने में सफल हुई तो उन्हें आंदोलन की लहर का फायदा मिलना तय है।


किसान आंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा के खिलाफ बना माहौल जगजाहिर हो चुका है। हालांकि पार्टी अपने दम पर सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी है, लेकिन आप की तरफ से अगर किसान नेताओं को चुनाव में उतारा गया तो भाजपा को अपने बचाव में यह कहने का मौका अवश्य मिल जाएगा कि किसान नेता सियासी फायदे के लिए आंदोलन चला रहे थे। कमोबेश यही चिंता संयुक्त किसान मोर्चे के सदस्य नेताओं की भी है और इसी कारण से किसान आंदोलन के किसी भी मंच पर किसी भी राजनीतिक दल के नेता को स्थान नहीं दिया जा रहा।

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