आफत ये टाल दी मौला

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मौला

कोई उम्मीद नहीं रूह तड़पी जाती है
हमें निज़ात दे आफ़त ये टाल दे मौला
उजाले रात से बद्तर हुए क्यों जाते हैं
सियाह रात है जुगनू ही टाँक दे मौला
बच्चे भूखे है यहाँ दर्द से बिलखते हैं
चाँद को तोड़ के बस्ती में बाँट दे मौला
उठी है लाश यहाँ हर एक दर ओ आँगन से
दिलों को सब्र दे आंखों को ज़ब्त दे मौला
मैं क्या कहूँ ज़ुबाँ ख़ामोश हुई जाती है
क़लम को ताब दे हाथों को थाम ले मौला
मेरी बस्ती के ये बच्चे उदास फ़िरते हैं
इन्हें तू छाँव दे शफ़क़त की, प्यार दे मौला
उजाले रात से बदतर हुए क्यों जाते है
सियाह रात है जुगनू ही टाँक दे

 

सिम्मी हशन
बलिया

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