आधुनिक समाजिक धर्म
आधुनिक समाजिक धर्म

मिस्टर नेहरा के परिवार की सुबह लगभग नौ से दस बजे के बीच होती है। सुबह एक एक करके सबके हाथ मोबाईल से जुड़ जाते हैं। अपना आधुनिक धर्म सबसे पहले मोबाईल पर निभाते हैं। सबके संदेशों का प्रतिउत्तर बहुत ही शालीनता के साथ शिष्टाचार निभाते हुए दिया जाता है। सुंदर विचारों की लड़ी मोबाईल में घुस घुसकर तलाशी जाती है फिर उसकी वर्षा सभी मित्रों पर की जाती है। फिर दूसरा कार्य स्टेटस पर किया जाता है। किसको गाली देनी थी पर दे नहीं पाये, किसको चिढ़ाना था पर चिढ़ा नहीं पाये, किसको ताना मारना था पर कह नहीं पाये, किसने हमारा दिल दुखाया आदि अनेक विचारों से लबालब दिमाग व्हटस्प पर स्टेटस बनाते हुए तानाबाना बुनता है। सोच विचार कर स्टेटस बनाकर चौबिस घंटे के लिये निश्चिंत हो जाते है। आधा घंटा इस शुभकार्य में बिताने के उपरांत चाय की प्याली पीते हुए अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ते हैं जो कि फेसबुक है। अब यही क्रिया फेसबुक पर भी दोहरायी जाती है साथ में समाज का भ्रमण भी किया जाता है। इस प्रकार जितने एप्पस सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं सब जगह अपनी उपस्थिति सुबह के साथ दर्ज करायी जाती है।

नाश्ते की टेवल पर सबको पहुँचते हुए ग्यारह से बारह बज जाते हैं। तब तक कामवाली बाई भी आ जाती है। नौकर दुकान खोल चुका होता है। मालिक फोन से पता लगा लेते हैं और दुकान की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं। मालकिन नौकरानी की मदद से घर के कार्य निपटा रही होती हैं व तीनों बच्चों और पति को दोपहर के भोजन में क्या खाना है पूछ रही होती हैं। बड़ा बेटा कॉलेज में है, छोटा बेटा दसवीं में व सबसे छोटी बेटी आठवीं कक्षा में है। कोरोना के कारण एक वर्ष से ऑनलाईन पढ़ाई हो रही है जिस कारण तीनों बच्चों के मुकदमे हर दूसरे तीसरे दिन आपसी लड़ाई के कारण होते रहते हैं। तीनों बच्चों ने अपने माता पिता जज बना रखा है और खुद वकील बनकर कभी कभार जज के फैसले को मानने से ही इंकार कर देते हैं। तीनों बच्चों के अपने अपने कमरे हैं जिनमें वो अकसर पढ़ाई का बहाना लेकर घंटों बंद रहते हैं। कम्प्यूटर पर गेम खेलना व मोबाईल पर लगे रहने की मानो उन्हें ऑनलाईन पढ़ाई के कारण छूट ही मिल गयी है। डाईनिंग टेवल पर खाना खाने के लिये एक साथ बैठते हुए भी उन्हें जोर पड़ता है।

पिता दुकान बढ़ाकर रात्रि नौ बजे तक घर आते हैं। नहा धोकर साढ़े नौ बजे तक खाने की टेवल पर परिवार के साथ भोजन करते हुए कभी जज, कभी आधुनिक पिता, कभी राजनीतिज्ञ, कभी सामाजिक चिंतक और अधिकतर समय ग्राहक की कमी का रोना रोते हुए चर्चा में लिप्त रहते हैं। कोरोना के कारण साल भर में उनका बहुत नुकसान हुआ है। देनदारी लेनदारी दोनों पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। जनता के पास रुपये ही नहीं हैं तो खरीदारी कहाँ से करेंगे? उन्होंने खुद अपने घर में सिवाय अनाज साग सब्जी और साबुन सरफ जैसी अति आवश्यकाताओं के अलावा कोई बड़ी खरीदारी नहीं की है। बच्चे घर से ऑनलाईन पढ़ाई कर रहे हैं मगर उनकी स्कूल-कॉलेज की फीस पूरी नियमित भरी जा राही है। आमदनी घटकर फिफ्टी परसेंट भी नहीं रही है। उस पर बच्चों का यूँ दिन रात मोबाईल/कम्प्यूटर में घुसे रहना उन्हें चिंता में डाल देता है। पिता की चाह है कि बच्चे सरकारी नौकरी लेकर सरकार की सेवा करें। मगर दुखी हैं यह सोच सोचकर की सरकार सरकारी नौकरी समाप्त करके सबको व्यापारी बनाने में लगी हुई है। और वह स्वयं व्यापारी की गिरती हालत से दुखी हैं। रात्रि के समय पूरा परिवार एक से डेढ़ घंटे तक आपस में सुनते सुनाते हैं। फिर अपने-अपने कमरे में अपने-अपने मोबाईल के साथ सोशल मीडिया पर देर रात तक समाजिक धर्म निभाते हैं।…

 संगीता कुमारी  (लेखिका / कवयित्री)

नरोरा एटॉमिक पावर स्टेशन, टाउन शिप बुलंदशहर

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