जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव रसूलपुर जाटान में प्राचीन समाधि के अवशेष- अशोक बालियान,

जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव रसूलपुर जाटान में प्राचीन समाधि के अवशेष- अशोक बालियान,

राजसत्ता पोस्ट

जनपद मुज़फ्फरनगर के हमारे गाँव रसूलपुर जाटान में प्राचीन समाधि के अवशेष- अशोक बालियान, चेयरमैन,पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन
हमे कोरोनो महामारी के बीच जनपद मुज़फ्फरनगर के हमारे गावं रसूलपुर जाटान में एक प्राचीन समाधि पर जाने का अवसर मिला। भारत पारंपरिक रूप से प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील रहा है। हमारे गाँव में सत्तर के दशक तक महामारी आने पर एक धार्मिक आयोजन किया जाता था, इस धार्मिक आयोजन में उस दिन कोई व्यक्ति लोहे को नही छूता था और उस दिन गाँव में कोई व्यक्ति प्रवेश नही करता था और न ही गाँव का कोई व्यक्ति बहार जा सकता था।
हमारे गावं में जब हम छोटे थे, उस समय घर पर कोठरी में माटी की हांड़ी में दही, मक्खन, घी और अचार रखा जाता था। घर की हाथ की चक्की में आटा पीसा जाता था। लेकिन गाँव में नींद न आने पर लोरी सुनाती दादी नानी, पनघट पर ठिठोली करती पनिहारिन आज गायब है। सरसों के तेल का दिया या मिटटी के तेल से जलने वाली डिबिया के मद्धिम प्रकाश में पढाई का जमाना काफी वर्ष पहले जा चुका है।
गाँव में घर से अलग घेर में खूंटे पर बंधा बैल जब सीना तान चभर-चभर सानी खाने लगता तो उसके गर्दन में बंधी घंटी और घुंघरु की आवाज़ बड़ी मधुर लगती थी। समय के साथ खेती से जुड़ी हमारी परम्परागत तकनीक गायब होती चली गई। और ट्रैक्टर आया तो धीरे-धीरे बैल गायब हो गये। गाँव में चारागाह और खेल मैदान तो रहे नहीं, आंगन में भी दीवार खिच गई है।

जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव रसूलपुर जाटान में प्राचीन समाधि के अवशेष- अशोक बालियान,
गाँव के लोग शर्म हया के दायरे में होते थे। लेकिन अब गाय, गोबर, और कंडे से दूर भागते लोग दूध-दही और लस्सी के बजाए व्हिस्की, व् कोक के दीवाने हो गए। भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने कोहराम मचा दिया है और गाँव में भी लोग डरने लगे है।
गाँव में देवी-देवताओं में स्थानीय लोगों की अटूट आस्था होती है। और गाँव में देवी-देवताओं का स्थान गांव के सार्वजनिक धार्मिक क्रियाकलापों का केंद्र होता है। पुराने समय से ही जहां भारत में देवी, देवताओं और भगवानों के मंदिर बने, तो दूसरी और ऋषि और मुनियों के समाधि स्थल भी बने। उल्लेखनीय है कि भारत में प्राचीनकाल से ही ऋषि और मुनियों की बैठक समाधि दी जाती रही है। साधु और संतों का दाह संस्कार नहीं होता था। समय के साथ कुछ समाधि स्थल को मजार में बदल दिया गया था।
हमारे गाँव रसूलपुर जाटान में पूर्व प्रधान सतेन्द्र बालियान के खेत के पास यह समाधि स्थल पहले गावं के एक मुख्य रास्ते पर था, लेकिन समय के साथ इस रास्ते के बंद होने से यह समाधि स्थल सैकड़ों साल पहले धीरे-धीरे सूना हो गया और इस कारण लोगों का यहां पर आना जाना पूरी तरह बंद हो गया था। अब देखरेख के अभाव में यह समाधि स्थल पूरी तरह नष्ट हो गया है।
इस समाधि स्थल की खास बात यह है कि इसमें ईंटों की लंबाई और चौड़ाई एक समान (8’ चौड़ाई व् 8’ लम्बाई) थी। गाँव के बुजूर्ग लोग बताते है कि आज इस अज्ञात समाधि स्थल पर गांवों के लोग दर्शनार्थ आते थे। पहले यह स्थान हमारे गाँव के पास आबाद गाँव पापड़हैली के रकबे में आता था लेकिन काफी पहले यह गावं भी गैरआबाद हो गया था।
भारत में लोक परंपराओं का अनूठा संगम भी देखने को मिलता है। लेकिन अब इस अज्ञात समाधि स्थल की कहानी शायद मेरी पोस्ट के साथ ही लुप्त हो जाएगी। इन्ही धरोहरों की खोज का हमारा अभियान जारी रहेगा। क्योकि हर कृति अपने आप में एक पूर्ण वृतान्त होती है।

जनपद मुज़फ्फरनगर के गाँव रसूलपुर जाटान में प्राचीन समाधि के अवशेष- अशोक बालियान,
लेखक अशोक बालियान मुज़फ्फरनगर

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